मैं मिस करुँगी? मिस तो शायद एक छोटा लफ्ज़ हैं नसानसात के लिए जो मैं तुम्हारे लिए रखने लगी हूँ , और अब मैं शायद खुद से डरने लगी हूँ |किसी से मोहब्बत इंसान को बहुत कमज़ोर बना देती हैं, बहुत बेबस, मजबूर, महकूम और मुझे इन तीनों चीज़ो से नफरत हैं | लेकिन उसके बावजूद तुम मेरी ज़िन्दगी का मरकज़ बनते जा रहे हो | तुम मुझसे पूछते हो की मुझे तुम्हारी क्या बात अच्छी लगती हैं ; मैं तुमसे ये कैसे कहूं की मुझे तुम्हारी कौन सी बात अच्छी नहीं लगती| अपने इर्द गिर्द तुम्हारा घूमना, मेरे वजूद से न हटने वाली तुम्हारी गहरी बोलती नज़रे, तुम्हारी हर वक़्त की तवज्जो, तुम्हारा जान छिड़कने वाला हर अंदाज़ | हर बार जब तुम मेरे माँ बाप के लिए एहतरामन खड़े रहते हो तो मैं तुम्हारे सामने झुकने लगती हूँ | इस छोटे से घर के पंखे वाले कमरे में तुम्हारी ये गहरी नींद, अपनी प्लेट को मेरी माँ के पके खाने से बार बार भरना और क्या कुछ नहीं जो मुझे तुम्हारे सामने मोम नहीं करता | पर ये सब मैं तुम्हे कभी नहीं कहूँगी, तुम्हारे हर वादे पर हसूंगी, तुम्हारी हर बात का मज़ाक़ उड़ाऊंगी | तुम मुझे संगमरमर समझते हो तो समझो, मैं तुम्हारे सामने रेत की दिवार नहीं बन सकती ; मुझे टूट जाने से खौफ आता हैं |
- कशफ मूर्तजा