आज बरसना हैं या सिर्फ गरज कर बह जाना हैं
सूरज को अभी यूँ ही थोड़ा सताना हैं
मेघदूत बनकर यक्ष का कोई सन्देश पहुँचाना हैं
आख़िर ये क्या ढूंढते होंगे
बहती हवाओं से शायद रास्ता पूछते होंगे
बंज़र ज़मीन ने अक़्सर बुलाया होगा
उस किसान की बेबसी ने कभी तो रुलाया होगा
जब छोटी थीं तो लगता था कोई इनके ऊपर रहता होगा
बिजली गिराकर अपनी बात कहता होगा
बारिश के लिए बादल में कोई सुइयाँ चुभाता होगा
कोई तो इनमे रंग मिलाता होगा
जब आसमां में रंग बदलते हैं
काले बादल एक दूसरे पर चलते हैं
सतरंगी धनुष जब निकलता हैं
बादल पर पाँव रखने को जी करता हैं
बेवक्त आ जाना इनकी रिवायत हैं
पर इससे मुझे न कोई शिकायत हैं
क्यूँकि बारिश से ठीक पहले के मौसम
अपने साथ लाता हैं एक ठहराव का सबब
नास्टैल्जिया की बहती हवा
बुनती यादों की कितनी कड़ी हैं
बारिश की ठंडी पहली बूँद
जो अभी बस तुम पर पड़ी हैं
जानती हूँ कुछ नहीं बस भाँप होना बादल की सच्चाई हैं
पर मेरे लिए अभी भी ये आसमां में बहती रहस्यमयी रजाई हैं
हर चीज़ में अफ़साने ढूंढ़ने की ये आदत हैं पुरानी
सो थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा पानी... और इक कहानी











