Saturday, 13 February 2021

यादों का मर्तबान



मुझे आजकल लगता हैं जैसे

मेरे यादों का मर्तबान भर गया हैं

कल हुआ कुछ याद नहीं रहता

और बिसरी पुरानी यादें बार बार आती हैं

ऐसा मुमकिन है क्या?

कभी कभी लगता हैं कि सब जी लिया

की आगे जो भी होगा वो बीते हुए का दुहराव होगा

या बस उसका एक छोटा तर्जुमा

कुछ नया सोचने में मन सिहरता हैं

कुछ बेहतर की आस करने से डरता हैं

नाउम्मीदी नकामयाबी से ज्यादा असर करता हैं 

और लगता हैं अब क्या ही फ़र्क़ पड़ता हैं 

पर सोचती हूँ मर्तबान खोलूं

जमा की हुई हर याद टटोलूँ

सूख कर गिर गये पत्तों में जो बची नमी होती हैं

शायद उसे ही याद कहते हैं

उन पत्तों के वजूद को नकार देना ज़्यादती हैं 

पर उनको न झड़ने देने की ज़िद बेवकूफ़ी

एक अरसे से जूझ रहे दर्द को छोड़ देना अच्छा हैं 

इस मर्तबान को अब तोड़ देना अच्छा हैं

बीता पीछे छोड़ देने में हर्ज़ क्या होगा 

कि अब इससे बुरा भी आख़िर क्या होगा 

नई हार, नई मुश्किलें

नये अफ़सोस, नई अटकले 

नई उल्फ़त, नए रंजिश

नया राग, नई बंदिश 

क्यूँकि क्या हैं ही वक़्त वक़्त पर

नया आगाज़ करना जरुरी हैं

वो जिसका जिक्र खुद से भी नहीं करते

सबसे पहले वो बात करना जरुरी हैं 

कि अगर कुछ हैं जो भुलाना हैं

तो उसे पहले अच्छे से याद करना जरुरी हैं

पता भी हो ग़र कुछ नहीं बदलेगा 

पर उस बदलाव का ख़्याल करना  ज़रूरी हैं