(9.01.2019 अदब,
Poetry competition, judged by Rekhta )
नमस्कार, खुशामदीद इस अदब की महफ़िल में आपकी खिदमत हैं
और नाम परिचय में कुछ रखा नहीं कि वो इस नज़्म कि तरह बेमतलब हैं
ये वो नज़्म है जिसमे न मोहब्बत और न दीवानगी का जिक्र हैं
बस खुद से रूबरू न हो पाने की छोटी सी फिक्र हैं
बात कुछ दिन पहले कि हैं जब रात एक चुप सी थी
और एक अजीब सी न ख़त्म होने वाली सवालों की दुनिया में मैं गुम सी थी
वो क्या हैं न exams का रुत था, ज़िन्दगी पहले से ही तंग थी
अपने आप के वजूद को पाने की शायद ये छोटी सी जंग थी
अजीब से सवाल थे जो इस मन में खटक रहे थे
Cp की गोल गलियोमें जैसे राह भटक रहे थे
मन में बस बेचैनी और इज़्तिराब था
कुछ न होने का गम, कुछ बनने का ख्वाब था
Hostel की चार दीवारों में घुट दम गया था
बिना कुछ सोचे यूँही तब बाहर का रुख़सत किया था
चलते चलते सोचती की जो कल तक था यकीन हर छोटी गुंजाइश में
आज फिर क्यों बँधी हुई हू मैं औरो की नुमाइश में
खुद को ही कोस रही, खुद ही की मेहरम बनी थी
सामने जब देखा तो अस्पताल के बाहर खड़ी थी
सड़क किनारे इस सर्दी में पतली चादर ओढ़े लेटे कुछ लोग थे मजबूर
बस अपनों की खैरियत की एक खबर सुनने को नासबूर
अंदर गई तो लोग बहुत थे पर दिखाई देते बड़े बीमार वो
मालूम होता जैसे अपनी कफ़न से मुस्तआर हो
लेटे हुए थे लिपटे बहुत से तारों के जंजाल में
बोतलों से टपकती बूंदो को ताकने लगी बहरहाल मैं
कुछ मरीज़ थे यहाँ सालों से अब तो यहीं उनका घर था
मौत से रोज़ एक जंग थी पर आँखों मे अब न कोई डर था
चारों तरफ ख़ामोशी का पहरा था
हर शख्स के सर पे गर्दिश का सेहरा था
ज़िन्दगी के बदन पे जैसे मौत का लिबास था
एक एक सांस के लिए भी मशीनो का एहतियाज़ था
इधर मंदिर पे प्रसाद चढ़ा था, उधर किसी ने पढ़ी नमाज़ थी
ऊपर वाले से सलामती की एक ही नियाज़ थी
icu का शीशे से एक शख्श दिखा जिसकी साँसे अब चल नहीं रही थी
बिजली के झटको से भी बात अब बन नहीं रही थी
स्क्रीन पे चलती लाइन अब न गिर न उठ रही थी
चेहरा ढक दिया गया था और डॉक्टरों की भीड़ अब छठ रही थी
बाहर बैठा उसका छोटा बेटा जिसपे नजाने कितने ऑपरेशन का क़र्ज़ हैं
अचानक महसूस हुआ की मेरा ज़मीर कितना खुदगर्ज हैं
सालों पढ़ते रह गए पर कितने नाफ़हम थे हम
दुनिया में इतना गम था खुद का गम था कितना कम
जो इधर मगरूर हैं हम अपने खुदी को पाने की कोशिश में
उधर कोई बैठा हैं अपने किसी को खो देने की रंजिश में
उस बच्चे को थामने की मगर मुझमे जहमत नहीं थी
सही मायने में जिसे दर्द कहते हैं उससे नज़र मिलाने की मेरी हिम्मत नहीं थी
तभी कहीं से किसी नवजात बच्चे के आवाज़ आई
अभी तो कोई सोया था मौत के आगोश में
और अभी किसी ने ज़िन्दगी की परवाज लगाई
पता चला वो जो एक बुजुर्ग थे coma मे उन्होंने सालों बाद आँखों को खोला हैं
वो लड़की थी न जो बोल नहीं सकती थी ना उसने आज अपना पहला हर्फ़ बोला हैं
ख़ुशी और गम का ये अजीब मेल था
सोचकर ताज्जुब हुआ की खुदा का ये कौन सा खेल था
जो तराश रही थी दुनिया में, सब कुछ तो अंदर था
मरकज़ में था ज़मीर तो, बाहर बस बवंडर था
जाना कि ज़िन्दगी एक कारवां हैं जो यूँ ही बढ़ता रहेगा
खुदको पाने, पाकर खोने का सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा
फिर कुछ याद आया जो शायद किसी किताब में पढ़ा था
फ़ाज़ली जी ने खुद अपने अल्फाज़ो में लिखा था
कि हर घड़ी खुद से उलझना हैं मुकद्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूँ, मुझी में हैं समंदर मेरा
किससे पूछूँ की कहाँ गुम हूँ बरसो से
हर जगह ढूंढ़ता फिरता हैं मुझे घर मेरा
एक से हो गए मौसमो के चेहरे सारे
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंजर मेरा
मुद्दते बीत गई ख्याब सुहाना देखे
जागता रहता हैं हर नींद में बिस्तर मेरा
आइना देखके निकला था मैं घर से बाहर
आज तक हाथ में मेहफ़ूज़ हैं पत्थर मेरा
Poetry competition, judged by Rekhta )
नमस्कार, खुशामदीद इस अदब की महफ़िल में आपकी खिदमत हैं
और नाम परिचय में कुछ रखा नहीं कि वो इस नज़्म कि तरह बेमतलब हैं
ये वो नज़्म है जिसमे न मोहब्बत और न दीवानगी का जिक्र हैं
बस खुद से रूबरू न हो पाने की छोटी सी फिक्र हैं
बात कुछ दिन पहले कि हैं जब रात एक चुप सी थी
और एक अजीब सी न ख़त्म होने वाली सवालों की दुनिया में मैं गुम सी थी
वो क्या हैं न exams का रुत था, ज़िन्दगी पहले से ही तंग थी
अपने आप के वजूद को पाने की शायद ये छोटी सी जंग थी
अजीब से सवाल थे जो इस मन में खटक रहे थे
Cp की गोल गलियोमें जैसे राह भटक रहे थे
मन में बस बेचैनी और इज़्तिराब था
कुछ न होने का गम, कुछ बनने का ख्वाब था
Hostel की चार दीवारों में घुट दम गया था
बिना कुछ सोचे यूँही तब बाहर का रुख़सत किया था
चलते चलते सोचती की जो कल तक था यकीन हर छोटी गुंजाइश में
आज फिर क्यों बँधी हुई हू मैं औरो की नुमाइश में
खुद को ही कोस रही, खुद ही की मेहरम बनी थी
सामने जब देखा तो अस्पताल के बाहर खड़ी थी
सड़क किनारे इस सर्दी में पतली चादर ओढ़े लेटे कुछ लोग थे मजबूर
बस अपनों की खैरियत की एक खबर सुनने को नासबूर
अंदर गई तो लोग बहुत थे पर दिखाई देते बड़े बीमार वो
मालूम होता जैसे अपनी कफ़न से मुस्तआर हो
लेटे हुए थे लिपटे बहुत से तारों के जंजाल में
बोतलों से टपकती बूंदो को ताकने लगी बहरहाल मैं
कुछ मरीज़ थे यहाँ सालों से अब तो यहीं उनका घर था
मौत से रोज़ एक जंग थी पर आँखों मे अब न कोई डर था
चारों तरफ ख़ामोशी का पहरा था
हर शख्स के सर पे गर्दिश का सेहरा था
ज़िन्दगी के बदन पे जैसे मौत का लिबास था
एक एक सांस के लिए भी मशीनो का एहतियाज़ था
इधर मंदिर पे प्रसाद चढ़ा था, उधर किसी ने पढ़ी नमाज़ थी
ऊपर वाले से सलामती की एक ही नियाज़ थी
icu का शीशे से एक शख्श दिखा जिसकी साँसे अब चल नहीं रही थी
बिजली के झटको से भी बात अब बन नहीं रही थी
स्क्रीन पे चलती लाइन अब न गिर न उठ रही थी
चेहरा ढक दिया गया था और डॉक्टरों की भीड़ अब छठ रही थी
बाहर बैठा उसका छोटा बेटा जिसपे नजाने कितने ऑपरेशन का क़र्ज़ हैं
अचानक महसूस हुआ की मेरा ज़मीर कितना खुदगर्ज हैं
सालों पढ़ते रह गए पर कितने नाफ़हम थे हम
दुनिया में इतना गम था खुद का गम था कितना कम
जो इधर मगरूर हैं हम अपने खुदी को पाने की कोशिश में
उधर कोई बैठा हैं अपने किसी को खो देने की रंजिश में
उस बच्चे को थामने की मगर मुझमे जहमत नहीं थी
सही मायने में जिसे दर्द कहते हैं उससे नज़र मिलाने की मेरी हिम्मत नहीं थी
तभी कहीं से किसी नवजात बच्चे के आवाज़ आई
अभी तो कोई सोया था मौत के आगोश में
और अभी किसी ने ज़िन्दगी की परवाज लगाई
पता चला वो जो एक बुजुर्ग थे coma मे उन्होंने सालों बाद आँखों को खोला हैं
वो लड़की थी न जो बोल नहीं सकती थी ना उसने आज अपना पहला हर्फ़ बोला हैं
ख़ुशी और गम का ये अजीब मेल था
सोचकर ताज्जुब हुआ की खुदा का ये कौन सा खेल था
जो तराश रही थी दुनिया में, सब कुछ तो अंदर था
मरकज़ में था ज़मीर तो, बाहर बस बवंडर था
जाना कि ज़िन्दगी एक कारवां हैं जो यूँ ही बढ़ता रहेगा
खुदको पाने, पाकर खोने का सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा
फिर कुछ याद आया जो शायद किसी किताब में पढ़ा था
फ़ाज़ली जी ने खुद अपने अल्फाज़ो में लिखा था
कि हर घड़ी खुद से उलझना हैं मुकद्दर मेरा
मैं ही कश्ती हूँ, मुझी में हैं समंदर मेरा
किससे पूछूँ की कहाँ गुम हूँ बरसो से
हर जगह ढूंढ़ता फिरता हैं मुझे घर मेरा
एक से हो गए मौसमो के चेहरे सारे
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंजर मेरा
मुद्दते बीत गई ख्याब सुहाना देखे
जागता रहता हैं हर नींद में बिस्तर मेरा
आइना देखके निकला था मैं घर से बाहर
आज तक हाथ में मेहफ़ूज़ हैं पत्थर मेरा
So much feelings ❤️😍
ReplyDeleteशुक्रिया 😆
DeleteThis comment has been removed by the author.
DeleteBahut acche.... Subhan Allah....
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