खुली आँखों से दिन रात कितने ही ख़्वाब मढ़ते हैं
रोज़ एक नई कहानी यूँ ही नहीं हम पढ़ते हैं
ये किस्से और कहानियाँ ही तो यादों का दरिया बन जाती हैं
जो नहीं जी सके हकीकत में उसे जीने का ज़रिया बन जाती हैं
किन्हीं अनजान लोगों से जोड़ते हम वास्ते हैं
इन किरदारों में हम खुद को तराशते हैं
कुछ किरदार ऐसे जिनकी दास्तान लगती सबसे सही हैं
देखकर जिन्हें लगता हैं की हमारी ज़िन्दगी ऐसी क्यों नहीं हैं
किस्मत ओर कामयाबी दोनों को ही दीदार होता हैं
ये वो हैं जिन्हें पहले पहल ही रूहानियत जैसा प्यार होता हैं
इनके कहे हर हर्फ़ पर गहरी नज़रे टिकी होती हैं
पूरी कहानी इन्हीं के लिए तो लिखी होती हैं
ये जब रोते हैं तो गम पढ़ने वाले को भी होता हैं
बीच में भले ही बुरे हो हालात पर आखिर में सब अच्छा होता हैं
मरकज़ से दूर कुछ किरदार ऐसे भी हैं जिनपे किस्मत की मेहरबानी कम हैं
भीड़ का एक चेहरा हैं जिसके हिस्से में लिखें हुए कई गम हैं
ये वो हैं जो मुख्य किरदार के अज़ीज यार होते हैं
या किसी का भूला बिसरा प्यार होते हैं
ये वो लोग हैं जो बस कहानी को बढ़ाते हैं
वो किरदार जिनके नाम हम अक़्सर भूल जाते हैं
वो जिनके पास उम्मीदों की जागीर नहीं होती
वो जिनके ख़्वाबों की ताबीर नहीं होती
जिनकी ज़िन्दगी में गम और अकेलेपन की कोई कसर नहीं होती
खुशियाँ कहाँ इन्हें पढ़ने वाले की हमदर्दी तक मयस्सर नहीं होती
वो जिनसे रिश्ते बनाये जाते हैं तोड़ दिए जाने के लिए
आलिंगन में भरे जाते हैं बस छोड़ दिए जाने के लिए
यादों के बोझ का भार ताउम्र सहते रहते हैं
किसी के लौट आने की राह में मुन्तज़िर रहते हैं
वो जो बस अपने उन्स के बदले की थोड़ी वफ़ाई ढूँढ़ते हैं
ओर इतना हार गए हैं ज़िन्दगी से की अब सिर्फ रुसवाई ढूंढ़ते हैं
पर तुम भला क्यों इस किरदार के पीछे कायल हो
शायद जितनी वो हैं उतनी तुम भी तो घायल हो
ये जो बिन बात तुमने अश्कों से दोस्ती कर ली हैं
खुद को जो गुज़रा उसका जिम्मेदार मानने की ज़िद कर ली हैं
शादमानी की कोई झलक नहीं बस दर्द का सरमाया हैं
तुम्हारे कमरे के आईने ने तुम्हें रोज़ बस रोते ही पाया हैं
पता हैं जब तुम्हारे चेहरे पर तबस्सुम की लाली छाती हैं
जब तुम्हारी छोटी आँखें थोड़ी और छोटी हो जाती हैं
तुम्हें वैसा देखने के लिए ये आइना तरस गया हैं
रंजिश का वो काला बादल भी अब बरस गया हैं
क्या सही था क्या गलत उसका हिसाब अब मत करो
उस बीती कहानी के पन्नों को बार बार पलटने की रट मत करो
हर वो चीज़ जो बांध रही तुम्हें तुम उससे राह मोड़ लो
मुझपर क्यों नहीं लिखा गया ये सोचना छोड़ दो
कि बस लिख के भुला दिया जाये इसकी तुम हक़दार नहीं
चंद पन्नों में सिमट के रह जाये ऐसा तुम्हारा किरदार नहीं
तुम उठाओ कागज़ और अपनी स्याह से भर दो
अपने वजूद को, अपनी आवाज़ को तुम पर दो
क्यों तुम्हारी भूमिका बस दूसरो की कहानी पूरी करना मात्र हो
तुम पर आधारित हो पूरी किताब तुम तो वो पात्र हो
गम की रूत लम्बी सही पर खुशियों का भी हिस्सा आएगा
किसी भरी महफ़िल में एक दिन तुम्हारा भी किस्सा आएगा
लिखो मगर इसलिए नहीं की कोई छाप छोड़ के जानी थी
या खुद को साबित करने की कोई रवानी थी
लिखो कि इन काँपते हुए हाथों को एक कलम थमानी जरुरी थी
अपनी खुदी को पाने की मानों कोई मजबूरी थी
लिखो कि ये एक अनसुना, अनकहा फ़साना था
एक किस्सा था जो सबके पहले खुद को ही सुनाना था
ओर ये छोटे छोटे किस्से ही तो हैं जो बाद में कभी दोहराये जाएंगे
क्यूँकि आख़िर में हम क्या; बस कहानियाँ ही तो बन जायेंगे |
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