Tuesday, 19 November 2019

नई सुबह


बार बार बदलती करवटे 
बिस्तर की तीख़ी सी सिलवटे 
परदों के कोने से झाकती रोशनी
दिवार पर टिक टिक करती घड़ी 
बगल में खुली पड़ी एक किताब
नींद की बची मोहलत का हिसाब 
जुगनुओं की चमक सूरज में फिर खो गई 
देखो फिर एक नई सुबह हो गई हैं 

बाहर की वो होड़ और खलबली 
खिड़की से ताकती हुई वो छिपकली 
फिर एक अधूरा टूटा ख़्वाब 
डायरी के पन्नों में पड़ा सूखा ग़ुलाब
पलकों पर लिपटा अलसाया आँचल 
आँखों के नीचे बिखरा काजल 
रात की वो फ़िज़ा फिर कही खो गई   
देखो फिर एक नई सुबह हो गई 

पर नींद के घरोंदे को जोड़ते हुए 
सारी जद्दोजहद से मुँह मोड़ते हुए 
दूसरी ओर करवट लेकर हमने चादर फिर खींच ली
उस ख्वाब को पूरा करने की ज़िद में आँखे फिर मींच ली 
नींद की पनाह में हमें फिर से खोने दो 
जागे हैं हम बड़ी देर से कुछ देर सोने दो 
सपनों की जागीर को ऐसे कैसे निसार करें 
सुबह से कह दो अभी ये थोड़ा और इंतज़ार करें 

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