Tuesday, 24 March 2020

ख़ामोशी

हर वक़्त एक शिकायत थी न तुम्हारी
की शून्य को देखे क्या सोचती रहती हूँ
हर बात बस सुनती हूँ तुम्हारी
वापस कभी कुछ नहीं कहती हूँ
पर मेरा न कहना मेरी कमज़ोरी नहीं हो जाती
हज़ार बार एक झूठ दोहराने से बात वो सच नहीं हो जाती
एक कोने में यूँ ही आहें भरती थी
इसलिए चुप नहीं थी के तुमसे डरती थी
तुम्हारे मन की बनाई दुनिया मेरी धुरी नहीं थी
और मेरा न बोलना मेरी मंजूरी नहीं थी
पर तुम्हें तो सिर्फ खुद में ही खोये रहने का मर्ज़ था
गर सुनना चाहते तो जानते उस ख़ामोशी का क्या तर्ज़ था
तुम्हें मुझको दिए सारे ज़ख्म साफ दिखाई देते
और तुम्हें मेरे हर अनकहे हर्फ़ साफ सुनाई देते
तुम्हारी नज़रे तुम्हारे वज़ूद को नकार देती
वो बेआवाज़ शोर तुम्हारे कानों के परदे फाड़ देती
खुद को पूरा खर्च कर देनी की मेरी क्या रज़ा थी
सालों तक तुम्हें सहने की वो क्या वज़ह थी
जिस दिन जानोगे उस दिन सो न सकोगे तुम
बेफिक्री से रो न सकोगे तुम
उस दिन न तुम रंग ए रेख्ता होंगे
न ही गुनाहों के देवता होंगे
जानोगे क्यों तुम्हारे किये पर मेरी कोई हरकत नहीं
क्यूँकि प्यार का उल्टा बेहिसि हैं, नफरत नहीं
शिकायत तो उससे होती हैं जिसपर ऐतबार हो
बातें तब होती हैं जब सामने वाला सुनने को तैयार हो
तो गर एक दिन तुम सुनने की हिम्मत रखोगे
कुछ जानने की थोड़ी ज़हमत करोगे
उस ख़ामोशी को गिरह को एक दिन खोलेंगे
बड़े इत्मीनान से वो सारी बातें बोलेंगे
तब तक ये ख़ामोशी ही तुम्हारा रकीब होगा
और मेरा कुछ न कहना ही तुम्हें नसीब होगा

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