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पुरानी आदत है मेरी
सब कुछ आधा छोड़ देने की
अधूरे शौक़, अधूरी ख्वाहिशें
अधूरी मिन्नतें, अधूरी रंजिशे
जैसे की वो तस्वीर जो पूरी करनी थीं
फिलहाल बस लकीरें हैं
सफ़ेद कागज़ पर खींची
अंजान, बेनाम लकीरें
बहुत सी कहानियाँ
जिनकी शुरुआत और अंजाम पढ़ा है
बीच में लिखा सब कुछ
मैंने बस कल्पनाओं में गढ़ा है
तमाम वो कसमें , तमाम अफ़साने
अधूरापन ज़िन्दगी का तर्ज़ हो गया
तमाम वो सपने जिन्हें पाना था
मगर जूनून कुछ खर्च हो गया
वो जो बीता और गुज़रा
जिसे उसी वक़्त बोलना चाहा
बिखर कर, टूट कर
खुद को ही जोड़ना चाहा
शब्द भी थे, बसीरत भी
सुना जाने की जरुरत भी
गर्दिश भी थीं, दस्तूर था
नज़्म को फिर भी अधूरा छूटना मंज़ूर था
महसूस होने और बयां कर पाने
के बीच में होता एक फासला है
उसे तय करना शायद
वक़्त ही सिखाता हैं
बहुत बातें अधूरी छोड़ी हैं मैंने
इसलिए नहीं की कुछ बोलने को नहीं था
हर्फ़ आ गये थे ज़बान तक
शायद कह पाने का हौसला नहीं था
अभी तक सोचती हूँ कि
काश बोल दिया होता
संकोच और लिहाज़ का
एक धागा खोल दिया होता
वो अधूरी मुलाक़ात, अधूरी हामी
जो अलविदा जिसमें कुछ तो था बाक़ी
सपनों में मैंने जाने से पहले एक बार रोका था
जाके भूल न जाना, ऐसे कहकर टोका था
न जाने की मैंने सारी वज़ह गिनाई थीं
नहीं भी जो पूछा, वो सारी बात बताई थीं
चाहे असलियत में कितने ही अधूरे हैं
मेरे ख्यालों में हम हर मायने में पूरे हैं

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