Monday, 31 August 2020

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी

( rendition of Amrita Pritam's  timeless piece on 101th birth anniversary )
                        


मैं तुम्हें फिर मिलूंगी 
कहाँ, कैसे पता नहीं 
शायद किसी गाने की धुन में 
जो ज़ेहन में कसक दे जाएगी 
या किसी पुरानी तस्वीर में 
जो अब ट्रैश में ही मिल पायेगी 
तुम्हारे कपड़ो की तह में 
मेरी गंध धीरे धीरे ख़त्म हो जाएगी 
उन तमाम लम्हों की याद में 
जिन्हें अब कभी नहीं दोहराएंगी 

पर मैं तुम्हें फिर मिलूंगी 
कहाँ, कैसे पता नहीं 
किसी सुबह की चाय जैसे 
गलती से तुम पर उझल जाउंगी 
कोई आतिश फ़िज़ा बनके 
छूकर तुम्हें बह जाउंगी 
वो एक गलती बनकर शायद 
जो जान कर भी कर देते हो तुम 
बारिश की पहली छीटों में 
जब अपनी बाहें खोल लेते हो तुम 

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी 
कहाँ, कैसे पता नहीं 
मिसालों में, सवालों में 
बेबसी की ढलानों में 
इंतजार में, तलाश में 
ग़म ए फ़राज़ में 
किसी महफ़िल की अफ़सानो में 
अजनबी तरानों में 
मैं तुम्हें फिर मिलूंगी 
पर कहाँ, कैसे, पता नहीं... 

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