Thursday, 24 December 2020

दिसम्बर

 


एक सपना बहुत सालों बाद फिर दिखा
उलझन सी थीं ;सब नासाफ था
दिसंबर की धुंध थीं
और न ख़त्म होने वाला रास्ता
फिर एक कोने पर तुम दिखाई दिए
पर वो सालों पहले का चेहरा था
और तुममें मैंने अपना पुराना प्रतिबिम्ब देखा
दूसरे ही पल तुम ओझल हो गये
और मैं बस ढूंढ रही हूँ
कोहरा ढल जाने के बाद भी
हर मोड़, हर पगडंडी पर
पर तुम कहीं नहीं
ये सपना था या मेरी कल्पना
ठीक याद नहीं
अक़्सर दोनों में भ्रान्ति होती है
पर एक चीज़ साफ हैं कि
मेरी कल्पनाओं में भी हम साथ नहीं 

किसी चीज़ को भुलाना 
अफ़सोस से निकल पाना
इतना मुश्किल क्यूँ होता हैं
एक पल को लगता हैं
अतीत से आगे बढ़ आये हैं
यादों को कहीं गहरा दफना आये हैँ
पर फिर कोई तस्वीर दिखती हैं
कोई पुरानी रसीद मिलती हैं
एक तारीख़ जो चाह के भी खुद के लिए आम नहीं हैं 
वो रास्ते जिस पर चल पाना अब भी आसान नहीं हैं 
एक गाना जो हर बार सुनना भारी लगता हैं
वो रुमाल जिसको जला देने का मन हर बारी करता हैं 
तब काश थोड़ी हिम्मत जुटाई होती
मन की बात बतलाई होती
जो बीत गया वो वापस कहाँ आता हैं 
बस ठीस का एक कतरा रह जाता हैं
ये होता तो क्या होता,
किसी और की आँखों से सब कैसा लगता हैं 
जो कभी तुम्हारा था ही नहीं
उसको खोना कैसा लगता हैं

शायद गलती मेरी नहीं
गलती इस महीने की हैं
सारे महीने आसानी से बीत जाते हैं 
बस ये आख़िरी अटकता हैं
बहुत मायनों में खटकता हैं
इसपर आने वाले साल के
सारे सपनें और  लक्ष्य सवार हैं
इस महीने को बीते हर साल की 
नाउम्मीदियों का बोझ करार हैं
दिसंबर की उस धुंध में
आज फिर खुद को पाया हैं
पिछले साल जितना ही
लाचार मेरा साया हैं
तुम धुंध में खो गये
क्यूँकि मैं तुम्हें ढूंढ़ रही थीं
और तुम कुछ और
और सच बतायूँ तो अब
भटक कर थक गई हूँ मैं
अभी आने वाले कल में ढलना सीखना हैं
अभी मुझे थोड़ा चलना सीखना हैं 

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