Saturday, 22 December 2018

अलविदा

कभी सोचती हूँ इन तारों को निहारते हुए
न जाने हैं ये  मुझसे कितने सालों दूर
हर एक तारा अपनी अनकही कहानी लिए हुए
एकदम स्थिर, निशब्द और मगरूर
पूछते थे न तुम कि क्या देखती रहती हूँ ऊपर
मैं देखती थी यादों के जुगनू को आसमा के चादर में
तुम लेकिन मत ढूंढ़ना मुझे कि
मैं अब नहीं मिलूंगी तुम्हे अतीत के सागर में
मैं होंगी किसी बरसाती छत पर
बिल्लियों को पुचकारते हुए
या किसी पार्क के बेंच पे
किसी की राह निहारते  हुए
मैं उन कागज़ के टुकड़ो  मे हू 
जो इक डायरी  से फाड़  दिए  गए थे
और उस बरगद की छाँव मे
जिसकी मिट्टी मे बेवजह आँसू बहा दिए  गए थे
मैं मिलूंगी रूमी के उस मैदान मे,
जहाँ ना कुछ सही ना गलत था
या खुसरो के उस दरिया  मे
जहाँ तैरना  ही बेमतल था
मैं भी वही एक तारा ही तो हू
होते हुए भी इक बीता फ़साना ही तो हू
कभी धुंधली कभी चमकते हुई दिख जाऊँगी
कभी बाकियों के साये मे छिप जाऊँगी
ढूंढना मुझे तुम तब भी और थोड़ा मुस्कुरा  देना
फुर्सत में याद करना वरना भले भुला देना
तकना तुम चाँद को ही मगर
ख़ुशी से जिंदगी का सफ़र कट जाएगा
क्यूंकि वक़्त को पीछे करना ही
मुझसे मिलने का एक ज़रिया बच  जाएगा
मैं तो बस वो चंद पलों की दूब हूँ
मत ढूंढ़ना मुझे तुम बरसात में
मैं हर जगह होकर भी कहीं नहीं होंगी
तुम्हे मिलूंगी शायद किसी और ही क़ायनात में |


No comments:

Post a Comment