(rendition of the beautiful song 'Ye kahan aa gye hum')
मैं और मेरी तन्हाई अक़्सर ये बातें करते हैं
तुम होते तो कैसा होता
तुम ये कहते, तुम वो कहते
कि तुम इस बात पर इतना बिगड़ते नहीं
तो मैं उस बात पर इतना मनाती नहीं
कि तुम होते तो ऐसा होता
कि तुम होते तो कैसा होता
मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करते हैं
तुम नहीं होते तो मैं यूँ छोटी छोटी बात पर रूठती नहीं
दिन रात यूँ बात करने के बहाने ढूंढ़ती नहीं
अभी के मुक़ाबले बेशक़ कम रोती
पर खुशियाँ भी कुछ कम मयस्सर होती
तुम नहीं होते तो ये खाने पर बखान नहीं होता
माइथोलॉजी की तरफ यूँ रुझान नहीं होता
मैं बेशक़ अभी से थोड़ा कम खाती
पर खाने का स्वाद भी थोड़ा कम पाती
तुम नहीं होते तो मैं काजल नहीं लगाती
आईने के सामने थोड़ा कम वक़्त बिताती
हर वक़्त इतना कहकहाती नहीं
बनिज़बत यूँ चहचहाती नहीं
तुम नहीं होते तो बारिश से प्यार नहीं होता
तस्वीरों को बार बार देखना का ख़ुमार नहीं होता
मेरा फ़ोन memes और gifs से भरा नहीं होता
मैंने मायूसी के घरोंदे से निकलने का फैसला करा नहीं होता
तुम नहीं होते तो शायद थोड़ी ज्यादा शांत होती
मौन नहीं तो कम से कम इतनी आकुल नहीं होती
पर उस शांति में वो पुराना नीरव शोर होता
अंतर्मन उद्वेग से सराबोर होता
तुम नहीं होते तो मैं गानों से इतना रिलेट नहीं करती
पॉलिटिक्स और सिनेमा की डिबेट नहीं करती
मैं अपनी अंदर की खामोशियों में मिट जाती
दुनिया की रिवायतों में सिमट जाती
तुम न होते तो शामें इतनी रंगीन न होती
तुमसे दूर रहने में हालत इतनी संगीन न होती
मुझे किसी पर ऐतबार करना नहीं आता
मुझे खुद से प्यार करना नहीं आता
तुम न होते तो ग़ज़ले न होती
ये आधी सिकी नज़्मे न होती
ये मन यूँ परवाना नहीं होता
ख़्वाबों का ये आशियाना नहीं होता
तुम न होते तो चाँद ख़ास कम होता
मुझमें आत्मविश्वास कम होता
मेरी अपनी आवाज़ नहीं होती
मुझमे वो परवाज़ नहीं होती
तुम नहीं होते तो आगे बढ़ने का बुनियाद नहीं होता
सड़क किनारे के ज़ायको का स्वाद नहीं होता
तुम नहीं होते तो लिखने के ख़यालात न आते
मेरे अंदर ये अफ़ीमी ज़ज्बात न आते
तुम न होते तो नींद थोड़ी ज्यादा आती
पर सपनों में मैं उन्हीं पुराने ज़ख्मों से झुंझलाती
तुमने हमेशा ही हर ग़म को बांटा हैं
कभी मुझे सही ग़लत के तराज़ू में नहीं आँका हैं
तुम न होते तो मैं चीज़ो का पैमाना नहीं जानती
जिस्मानी बंदिशों से परे हो ऐसा याराना नहीं जानती
मेरे हर अश्क़ को समेटा तुमने अपनी बाहों में
तुमने मुझे चलना सिखाया ज़िन्दगी की राहों में
सोते हुए बगल में इक तकिया तुम्हारे लिए भी लगाती हूँ
तुमसे दूर होकर भी तुम्हें मैं अपने कितना करीब पाती हूँ
मैं और मेरी मेरी तन्हाई अक़्सर ये बात करते हैं
कि तुम न होकर भी यहीं हो; यहीं बस यहीं कही हो|
मैं और मेरी तन्हाई अक़्सर ये बातें करते हैं
तुम होते तो कैसा होता
तुम ये कहते, तुम वो कहते
कि तुम इस बात पर इतना बिगड़ते नहीं
तो मैं उस बात पर इतना मनाती नहीं
कि तुम होते तो ऐसा होता
कि तुम होते तो कैसा होता
मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करते हैं
तुम नहीं होते तो मैं यूँ छोटी छोटी बात पर रूठती नहीं
दिन रात यूँ बात करने के बहाने ढूंढ़ती नहीं
अभी के मुक़ाबले बेशक़ कम रोती
पर खुशियाँ भी कुछ कम मयस्सर होती
तुम नहीं होते तो ये खाने पर बखान नहीं होता
माइथोलॉजी की तरफ यूँ रुझान नहीं होता
मैं बेशक़ अभी से थोड़ा कम खाती
पर खाने का स्वाद भी थोड़ा कम पाती
तुम नहीं होते तो मैं काजल नहीं लगाती
आईने के सामने थोड़ा कम वक़्त बिताती
हर वक़्त इतना कहकहाती नहीं
बनिज़बत यूँ चहचहाती नहीं
तुम नहीं होते तो बारिश से प्यार नहीं होता
तस्वीरों को बार बार देखना का ख़ुमार नहीं होता
मेरा फ़ोन memes और gifs से भरा नहीं होता
मैंने मायूसी के घरोंदे से निकलने का फैसला करा नहीं होता
तुम नहीं होते तो शायद थोड़ी ज्यादा शांत होती
मौन नहीं तो कम से कम इतनी आकुल नहीं होती
पर उस शांति में वो पुराना नीरव शोर होता
अंतर्मन उद्वेग से सराबोर होता
तुम नहीं होते तो मैं गानों से इतना रिलेट नहीं करती
पॉलिटिक्स और सिनेमा की डिबेट नहीं करती
मैं अपनी अंदर की खामोशियों में मिट जाती
दुनिया की रिवायतों में सिमट जाती
तुम न होते तो शामें इतनी रंगीन न होती
तुमसे दूर रहने में हालत इतनी संगीन न होती
मुझे किसी पर ऐतबार करना नहीं आता
मुझे खुद से प्यार करना नहीं आता
तुम न होते तो ग़ज़ले न होती
ये आधी सिकी नज़्मे न होती
ये मन यूँ परवाना नहीं होता
ख़्वाबों का ये आशियाना नहीं होता
तुम न होते तो चाँद ख़ास कम होता
मुझमें आत्मविश्वास कम होता
मेरी अपनी आवाज़ नहीं होती
मुझमे वो परवाज़ नहीं होती
तुम नहीं होते तो आगे बढ़ने का बुनियाद नहीं होता
सड़क किनारे के ज़ायको का स्वाद नहीं होता
तुम नहीं होते तो लिखने के ख़यालात न आते
मेरे अंदर ये अफ़ीमी ज़ज्बात न आते
तुम न होते तो नींद थोड़ी ज्यादा आती
पर सपनों में मैं उन्हीं पुराने ज़ख्मों से झुंझलाती
तुमने हमेशा ही हर ग़म को बांटा हैं
कभी मुझे सही ग़लत के तराज़ू में नहीं आँका हैं
तुम न होते तो मैं चीज़ो का पैमाना नहीं जानती
जिस्मानी बंदिशों से परे हो ऐसा याराना नहीं जानती
मेरे हर अश्क़ को समेटा तुमने अपनी बाहों में
तुमने मुझे चलना सिखाया ज़िन्दगी की राहों में
सोते हुए बगल में इक तकिया तुम्हारे लिए भी लगाती हूँ
तुमसे दूर होकर भी तुम्हें मैं अपने कितना करीब पाती हूँ
मैं और मेरी मेरी तन्हाई अक़्सर ये बात करते हैं
कि तुम न होकर भी यहीं हो; यहीं बस यहीं कही हो|
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