Tuesday, 21 April 2020

मेरा शहर

मेरे शहर मुझे एक खूबसूरत मंज़र जैसा लगता हैं
कभी ये बेतुकी दलीलों के ख़ंजर जैसा लगता हैं
जहाँ धौंकनी लू भी चलती हैं और सर्द हवाएं भी
जहाँ सब धुएँ से धुंधला हैं,ठहरी हुई हैं फ़िज़ाए भी

इस शहर में ढेरों स्मारक हैं, कहीं गंदे बहते नाले हैं
कहीं संकरी गालियाँ हैं तो कहीं आलीशान माले हैं
गिरजाघर की कोरस भी और बंगला साहिब का तालाब भी
मंदिर की घंटियों की गूँज और मस्जिद का आज़ान भी

कभी कभी लगता हैं कि ये शहर इक शायरी महज़ की तरह हैं
या अमृता प्रीतम के शहर के जैसे इक लम्बी बहस की तरह हैं
मंटो की तख़्त ए सियाह के जैसे तीखे सच संजोये हुए
कभी रूमी के किसी नज़्म जैसे रूहानियत में पिरोये हुए

चांदनी चौक की गालियाँ और इंडियन कॉफ़ी हॉउस की छत
जो सरोजनी,  जनपथ पर दुकानदारों की खरीदने की रट
सेंट्रल पार्क का फॉन्टैन शो या फिर चौरंगी लेन
या दूर फ्लाईओवर पर गुज़रती कोई मेट्रो ट्रेन

कभी कभी ये शहर मुझे तुम्हारे जैसा लगता हैं
शिकायते बहुत हैं पर बेहरहाल अपना सा लगता हैं
तुम्हारे तरह इस शहर का हर कोना जानती हूँ
सारी आशनाओ और गहराईयों को अच्छे से पहचानती हूँ

कभी खामोशियों में लिपटा कभी किसी गरल में
नीलेश मिश्रा के याद शहर के बिल्कुल बगल में
बात बेबात पर जो अपनी ही बात कहता हैं
मेरे अंदर मेरा छोटा सा शहर रहता हैं

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