आज फिर लालसा की पगडंडी पर तुमने चलना चाहा
महत्वाकांक्षा के इक पुल को तुमने कसकर बांधा
संभावनाओं का तुमने एक स्कन्ध बनाया
खुद की बनाई अनिश्चिन्ताओं का भार तुमने फिर उठाया
निकल पड़े हो दोसरों के सपनों की जागीर को पाने
असीमित संसार की सीमित परिभाषा को जाने
माना कि तुम्हारा ये अभिभूत मन बिल्कुल अकेला हैं
पर इस भीड़ में तुमने फिर आज खुद को धकेला हैं
भिड़ गए हो तुम भी एक अर्धनिर्मित शिखर को पाने को
इस अंजुमन के हर व्यक्ति की कहानी दोहराने को
अपनी मनोकांक्षा को अस्वीकार करना मान लिया
दुनिया के बनाये साँचे में खुद को ढाल लिया
हासिल तुम्हें वो जाना पहचाना ख़िताब करना हैं
हासिल तुम्हें वो बेमतलब पड़ाव करना हैं
हासिल तुम्हें शौर्य तमाम करना हैं
हासिल तुम्हें शाबाशी का मक़ाम करना हैं
हासिल तुम्हें भेड़चाल की पराकाष्टा करनी हैं
हासिल वो अपरिपूर्ण कामना करनी हैं
हासिल तुम्हें वो समझौता करना हैं
हासिल शायद तुम्हें भी वो मुखौटा करना हैं
पर कल्पनाओं की दीवारों में यूँ सेंध लगा दोगे
अंतर्ध्वनि को ऐसे कैसे तुम चुप करा दोगे
एक जैसी दिखने वाली खोखली इमारतों के तले
तुम क्या अपने अस्तित्व की कुटिया दबा दोगे
हासिल करना ही हैं तो परमार्थ को करो
अपने भीतर छुपे यथार्थ को करो
जिसे समय की सीमा से बाध्य न हो
हासिल उस जीवन सार्थ को करो |

This poem deserves to be a NCERT chapter for class 10th������
ReplyDelete