1. कसप
मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखित एक प्रेम कथा जिसे पढ़कर हिंदी के साथ साथ कुमाऊंनी भाषा से भी प्यार हो जाये| कहानी का नायक देवीदत्त त्रिपाठी (डी डी )जितना विद्यमान और परिष्कृत हैं नायिका बेबी (मैत्री शास्त्री )उतनी ही अल्हड़ और दबंग|दोनों की मुलाक़ात बड़े ही हास्यास्पद ढंग से एक शादी में होती हैं जहाँ बेबी को देखकर डी डी के मन में दो ख्याल आते हैं एक की ये लड़की मुझे अब कभी न दिखे और दूसरा कि जब तक साँसे चल रही हैं इसी लड़की का चेहरा निरंतर दिखता रहे|नायक बम्बई चला जाता हैं और नायिका अल्मोड़ा पर दोनों में परस्पर खत से बातचीत होती रहती हैं |बेबी अपने प्रेमपत्र अपने पिता से पढ़वाती हैं और वो नायक से गुस्सा होने के बजाय बस प्रभावित होते हैं कि ये जो भी व्यक्ति हैं वो कितना ज्ञानवान हैं और यहाँ तक की स्वयं उससे बात और सुझाव देने लगते हैं|लेकिन सामाजिक तत्व और जातिवाद इनके प्रेम के आड़े आता हैं |इस उपन्यास को पढ़कर आप जानेगे कि कैसे दो शब्दों में प्रेम का इज़हार किया जा सकता हैं - जिलेम्बू, मारगांठ |कैसे दो लोग जो एक दूसरे के एकदम विपरीत हैं कैसे उनकी कल्पना एक दुसरे के बगैर नहीं की जा सकती|नायक जो की बचपन से अनाथ हैं, उसने अपने जीवन में बस संघर्ष और ऊपरी सहानुभूति ही देखी हैं|उसके विपरीत बेबी बड़े लाड और आराम की ज़िन्दगी जीती आई हैं |नायक एक स्वनिर्मित और बहुत खुद्दार व्यक्ति जो ट्रेन के सफर में खुद से यह कहता हैं कि उसके पास संघर्ष का टिकट होगा, सुविधा का रिजर्वेशन नहीं|कसप का अर्थ पहाड़ी भाषा में होता हैं 'पता नहीं ' और ये बाक़ी कहानियों के बहुत भिन्न और इसे पढ़कर नैनीताल, अल्मोड़ा, हल्द्वानी के सुरम्य नज़ारो और मीठी बोली से आपका परिचय हो जायेगा|
2. मैला आँचल
फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा लिखित ये आँचल उपन्यास बिहार के पूर्णिया जिले के एक गांव पर केंद्रित हैं |कहानी स्वतंत्रता से कुछ पहले से शुरू होती हुई उसके बाद तक की एक व्यापक कहानी और अखंडनीय सत्य को दर्शाती हैं |ये कहानी अनेकों पात्रों के जीवन को अपने अंदर समेटे हैं | अब वो तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद का ह्रदय परिवर्तन हो या उनकी बेटी कमली की कहानी | कमली जो बीमार होने का ढोंग करती हैं, नल दमयंती के चित्र के नीचे डॉ प्रशांत और कमली लिख देती हैं| डॉ प्रशांत इस पिछरे गांव में मलेरिया, काला अज़र के इलाज़ और शोध के लिए आया हैं और कुछ ही समय में इस गांव और कमली से प्यार कर बैठता हैं | बाल ब्रह्मचारी कालीचरण और चरखा सेंटर वाली मैडम की कहानी हैं | बलदेव मिश्र के संघर्षो और लछ्मी दासिन के कष्टों की कहानी हैं | लछ्मी दासिन जो बचपन से महंतो के कुकर्मो को सहते आई हैं मानो के जैसे कोई औरत देवताओं के शिविर में भी सुरक्षित नहीं | ये कहानी बावनदास के अन्याय की हैं फुलिया के प्यार की भी| पारबती मौसी,मंगला,रामपिरिया, महंत और जाने कितने और पात्र जो एक सजीव चित्रण करते हैं एक गांव की, वहाँ के जातिवाद, अंधविश्वास, कुरीतियों, झगड़ों और स्वतंत्रता संग्राम की |ये किताब आज़ादी के बाद की लोगों की प्रतिक्रिया का उल्लेख करती हैं, गाँधी की हत्या के शोक का भी, विभाजन के वीभत्स रूप का भी जो ये सोचने पर मज़बूर कर देता हैं कि कहीं हमें झूठी आज़ादी तो नहीं मिली |राजनीतिक दलीलों से लेकर लोक पुराणों तक, अज़ीबो गरीब नारों से लेकर अतरंगे हिंगलिश गानों तक, बहुत सारी गूंज आपके साथ रह जाएंगी |ग्रामीण जीवन को उसकी समग्रता में चित्रित करने वाला यह एक सशक्त उपन्यास हैं|
3. सूरज का सातवाँ घोड़ा
मैंने क्या जिया? मुझे तो जीवन ने जिया,
बूँद बूँद कर पिया
मुझको पीकर पथ पर खाली प्याले सा छोड़ दिया
मैं क्या जला? मुझे तो अग्नि ने छला
मैं कब पूरा गला, मुझको थोड़ी सी आंच दिखा दुर्बल मोमबत्ती सा मोड़ दिया
देखो मुझे, हाय मैं वो सूर्य
जिसे भरी दोपहर में अंधियारे ने तोड़ दिया
माणिक मुल्ला द्वारा अपने दोस्तों को सुनाई गई कई कहानियाँ जो उनकी असल ज़िन्दगी के ही अंश हैं और बयान करते हैं या करने की कोशिश करते हैं प्रेम के यथार्थ को | ये कहानी जमुना, लिली और सत्ती की हैं और साथ ही माणिक मुल्ला के व्यक्तित्व और अभिरुचियों की| प्रेम क्या एक बार ही होता हैं या हर प्रेम जीवन एक पड़ाव हैं और अपने आप में एक सीख | मगर प्रेम को बस मात्र एक सीख कह देना इस अनोखी अनुभूति का तिरस्कार नहीं हैं? क्या ये सामने वाले व्यक्ति के प्रति आपकी अनुकम्पा कम नहीं कर देता? क्या प्रेम की अपूर्णता में भी सम्पूर्णता का एहसास पाया जा सकता हैं? हर प्रेम विशिष्ट होता हैं तो फिर क्यों एक का प्रतिबिम्ब दूसरे में नज़र आता हैं?उस विशिष्टता की फिर क्या परिभाषा और क्या मर्यादा हैं? अगर प्रेम का अर्थ मुक्ति हैं तो बिछड़ना इतना मुश्किल क्यों होता हैं? और अगर प्रेम खुद को बेहतर इंसान बनाने की इक प्रक्रिया हैं तो विरह के बाद सारी गलतियां और अनकही बातें ही क्यों याद रहती हैं? खैर ये कुछ सवाल हैं जो उपजते हैं इन कहानियों को पढ़कर पर जवाब शायद नहीं मिलते क्यूँकि शायद इनका कोई एक जवाब हो नहीं सकता | इन सब के अलावा सामाजिक जटिलताओं और पारिवारिक समस्याओं का भी अनुपात इस लघु उपन्यास में मिलता हैं | कहानी का कोई एक निष्कर्ष अभी नहीं होता | वो बदलता हैं श्रोता के पूर्व ज्ञान, परिस्थिति और अनुभवों के हिसाब से |
"हमेशा अँधेरे को चीर कर आगे बढ़ने, समाज-व्यवस्था को बदलने और मानवता के सहज मूल्यों को पुन: स्थापित करने की ताकत और प्रेरणा दी है। चाहे उसे आत्मा कह लो, चाहे कुछ और। और विश्वास,साहस, सत्य के प्रति निष्ठा, उस प्रकाशवाही आत्मा को उसी तरह आगे ले चलते हैं जैसे सात घोड़े सूर्य को आगे बढ़ा ले चलते हैं।'"
4. कितने पाकिस्तान
इस किताब की भूमिका में कमलेश्वर ने लिखा की वक़्त ही इस उपन्यास का नायक भी हैं, महानायक भी हैं और खलनायक भी |ये उपन्यास समय की सीमाओं को लांगता हुआ और पारम्परिक कहाणीकरण और परिपेक्ष को पीछे छोड़ता हुआ इतिहास के अनेकों मुद्दों पर आपका ध्यान केंद्रित करता हैं और निरपेक्ष निर्णय सुनाता हैं | सारी घटनाएं एक अदालत में होती हैं जहाँ इतिहास के कई प्रसिद्ध व्यक्तियों को कटघरे में लाया जाता हैं | प्रोमिथेउस से लेकर औरंगजेब को, हिटलर से लेकर स्टालिन को, मौन्टबेटन से लेकर जिन्नाह को | और लाया जाता हैं उन कई अनाम लाशो को जो मरते आये हैं, शहीद होते आये हैं सियासी और धार्मिक मुठभेड़ों की वज़ह से | यहीं नहीं उन लाशों का मानवीकरण भी होता हैं और उनके सवाल भी सामने रखे जाते हैं |ये दिखाया गया हैं की भगवान के नाम पर, धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, सियासत के नाम पर, विचारधाराओं के नाम पर न जाने कितने विभाजन हुए हैं, कितने पाकिस्तान बने हैं और शायद आगे भी बनेंगे |ये शुरू होता हैं देवों और पुराणों से पर फिर भी आज की परिस्थिति में भी उतना ही सटीक बैठता हैं |अदीब और अर्धली मुख्य किरदार हैं और फिर जुड़ती हैं अनेकों ऐतिहासिक घटनाएं और जुड़े पात्र, पात्र ग्रीक देवताओं, राजा गिलगमेश, ऋषि गौतम, सुमेरियन सभ्यताओं से होता हुआ, भारत और संसार के पूरे इतिहास में हर नामी इंसान का जिक्र होता हैं | जिक्र होता हैं देवों और इंसान के युद्ध से लेकर उन तमाम युद्धो का जिनमें कोई नहीं जीता पर मानवता सदैव ही हारी हैं | नैटो से लेकर हिरोशिमा, बाबरी मस्जिद से लेकर भारत की आज़ादी, सांप्रदायिक दंगे, विभाजन और द्विदनांक दौर का पूरा विस्त्रित ब्यौरा किया गया हैं |इसमें बूटा सिंह और जैनिब की कहानी हैं, सुल्ताना और अदीब की कहानी हैं|कहानी हैं उन कई बेगुनाहों की, शाषकों के महत्वाकांक्षाओं की, कई प्रसिद्ध लोगों के अपराधों की, लोगों में नफ़रत घोल रहे सियासत की, कहानी हैं आगे के विभाजनों को रोकने की आस की क्यूँकि आख़िर में पछतावा मानव हैं इतिहास नहीं |
5. गुनाहों का देवता
ये कहानी चन्दर और सुधा की हैं और उनके पवित्र और निस्स्वार्थ प्रेम की, आज की भाषा में प्लेटोनिक लव की जो कि लगभग विलुप्त हैं | चन्दर अपने गुरू और प्रोफेसर के साथ रहता हैं और उनकी बेटी सुधा से प्यार का आभास तब होता हैं जब उसकी शादी तय हो जाती हैं और वो विदा हो जाती हैं |वह प्रेम और नैतिकता के द्वन्द में फंस जाता हैं और सुधा को रोक नहीं पाता |विरह की पीड़ा और गुनाहों के बोझ में दबता ही चला जाता हैं |जब तक सुधा सामने रही कभी उसे यह मालूम नहीं हुआ कि सुधा का क्या महत्त्व हैं उसकी ज़िन्दगी में और जब वो दूर हो जाती हैं तो वह देखता हैं कि वो साँसों से ज्यादा आवश्यक थी ज़िन्दगी के लिए |ये कहानी जितनी सुधा की हैं उतनी ही पम्मी की भी और उतनी ही बिनती की भी | अपनी भावनाओं को भुलाने के लिए वो पम्मी से जा मिलता हैं और उस प्रेम से रूबरू होता हैं जो जिस्मानी हैं मगर तब भी उसकी चेतना कुछ और तराशती हैं |उधर सुधा जो एक हंसती खेलती ज़िन्दगी जी रही थी वेदना और संताप के बादलों से घिर जाती हैं और उसके कहे शब्द उसपर ही लागू हो जाते हैं , 'कैफ बरदोश बादलों को न देख, बेखबर तू न कुचल जाये कहीं '|कहानी के शुरू और आखिर की तुलना मन को क्षीण कर देती हैं | ये उपन्यास प्रेम के हर रूप, भावना और परीकाष्ठता का बहुत सजीव और वास्तविक चित्रण करती हैं |
मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखित एक प्रेम कथा जिसे पढ़कर हिंदी के साथ साथ कुमाऊंनी भाषा से भी प्यार हो जाये| कहानी का नायक देवीदत्त त्रिपाठी (डी डी )जितना विद्यमान और परिष्कृत हैं नायिका बेबी (मैत्री शास्त्री )उतनी ही अल्हड़ और दबंग|दोनों की मुलाक़ात बड़े ही हास्यास्पद ढंग से एक शादी में होती हैं जहाँ बेबी को देखकर डी डी के मन में दो ख्याल आते हैं एक की ये लड़की मुझे अब कभी न दिखे और दूसरा कि जब तक साँसे चल रही हैं इसी लड़की का चेहरा निरंतर दिखता रहे|नायक बम्बई चला जाता हैं और नायिका अल्मोड़ा पर दोनों में परस्पर खत से बातचीत होती रहती हैं |बेबी अपने प्रेमपत्र अपने पिता से पढ़वाती हैं और वो नायक से गुस्सा होने के बजाय बस प्रभावित होते हैं कि ये जो भी व्यक्ति हैं वो कितना ज्ञानवान हैं और यहाँ तक की स्वयं उससे बात और सुझाव देने लगते हैं|लेकिन सामाजिक तत्व और जातिवाद इनके प्रेम के आड़े आता हैं |इस उपन्यास को पढ़कर आप जानेगे कि कैसे दो शब्दों में प्रेम का इज़हार किया जा सकता हैं - जिलेम्बू, मारगांठ |कैसे दो लोग जो एक दूसरे के एकदम विपरीत हैं कैसे उनकी कल्पना एक दुसरे के बगैर नहीं की जा सकती|नायक जो की बचपन से अनाथ हैं, उसने अपने जीवन में बस संघर्ष और ऊपरी सहानुभूति ही देखी हैं|उसके विपरीत बेबी बड़े लाड और आराम की ज़िन्दगी जीती आई हैं |नायक एक स्वनिर्मित और बहुत खुद्दार व्यक्ति जो ट्रेन के सफर में खुद से यह कहता हैं कि उसके पास संघर्ष का टिकट होगा, सुविधा का रिजर्वेशन नहीं|कसप का अर्थ पहाड़ी भाषा में होता हैं 'पता नहीं ' और ये बाक़ी कहानियों के बहुत भिन्न और इसे पढ़कर नैनीताल, अल्मोड़ा, हल्द्वानी के सुरम्य नज़ारो और मीठी बोली से आपका परिचय हो जायेगा|
2. मैला आँचल
फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा लिखित ये आँचल उपन्यास बिहार के पूर्णिया जिले के एक गांव पर केंद्रित हैं |कहानी स्वतंत्रता से कुछ पहले से शुरू होती हुई उसके बाद तक की एक व्यापक कहानी और अखंडनीय सत्य को दर्शाती हैं |ये कहानी अनेकों पात्रों के जीवन को अपने अंदर समेटे हैं | अब वो तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद का ह्रदय परिवर्तन हो या उनकी बेटी कमली की कहानी | कमली जो बीमार होने का ढोंग करती हैं, नल दमयंती के चित्र के नीचे डॉ प्रशांत और कमली लिख देती हैं| डॉ प्रशांत इस पिछरे गांव में मलेरिया, काला अज़र के इलाज़ और शोध के लिए आया हैं और कुछ ही समय में इस गांव और कमली से प्यार कर बैठता हैं | बाल ब्रह्मचारी कालीचरण और चरखा सेंटर वाली मैडम की कहानी हैं | बलदेव मिश्र के संघर्षो और लछ्मी दासिन के कष्टों की कहानी हैं | लछ्मी दासिन जो बचपन से महंतो के कुकर्मो को सहते आई हैं मानो के जैसे कोई औरत देवताओं के शिविर में भी सुरक्षित नहीं | ये कहानी बावनदास के अन्याय की हैं फुलिया के प्यार की भी| पारबती मौसी,मंगला,रामपिरिया, महंत और जाने कितने और पात्र जो एक सजीव चित्रण करते हैं एक गांव की, वहाँ के जातिवाद, अंधविश्वास, कुरीतियों, झगड़ों और स्वतंत्रता संग्राम की |ये किताब आज़ादी के बाद की लोगों की प्रतिक्रिया का उल्लेख करती हैं, गाँधी की हत्या के शोक का भी, विभाजन के वीभत्स रूप का भी जो ये सोचने पर मज़बूर कर देता हैं कि कहीं हमें झूठी आज़ादी तो नहीं मिली |राजनीतिक दलीलों से लेकर लोक पुराणों तक, अज़ीबो गरीब नारों से लेकर अतरंगे हिंगलिश गानों तक, बहुत सारी गूंज आपके साथ रह जाएंगी |ग्रामीण जीवन को उसकी समग्रता में चित्रित करने वाला यह एक सशक्त उपन्यास हैं|
3. सूरज का सातवाँ घोड़ा
मैंने क्या जिया? मुझे तो जीवन ने जिया,
बूँद बूँद कर पिया
मुझको पीकर पथ पर खाली प्याले सा छोड़ दिया
मैं क्या जला? मुझे तो अग्नि ने छला
मैं कब पूरा गला, मुझको थोड़ी सी आंच दिखा दुर्बल मोमबत्ती सा मोड़ दिया
देखो मुझे, हाय मैं वो सूर्य
जिसे भरी दोपहर में अंधियारे ने तोड़ दिया
माणिक मुल्ला द्वारा अपने दोस्तों को सुनाई गई कई कहानियाँ जो उनकी असल ज़िन्दगी के ही अंश हैं और बयान करते हैं या करने की कोशिश करते हैं प्रेम के यथार्थ को | ये कहानी जमुना, लिली और सत्ती की हैं और साथ ही माणिक मुल्ला के व्यक्तित्व और अभिरुचियों की| प्रेम क्या एक बार ही होता हैं या हर प्रेम जीवन एक पड़ाव हैं और अपने आप में एक सीख | मगर प्रेम को बस मात्र एक सीख कह देना इस अनोखी अनुभूति का तिरस्कार नहीं हैं? क्या ये सामने वाले व्यक्ति के प्रति आपकी अनुकम्पा कम नहीं कर देता? क्या प्रेम की अपूर्णता में भी सम्पूर्णता का एहसास पाया जा सकता हैं? हर प्रेम विशिष्ट होता हैं तो फिर क्यों एक का प्रतिबिम्ब दूसरे में नज़र आता हैं?उस विशिष्टता की फिर क्या परिभाषा और क्या मर्यादा हैं? अगर प्रेम का अर्थ मुक्ति हैं तो बिछड़ना इतना मुश्किल क्यों होता हैं? और अगर प्रेम खुद को बेहतर इंसान बनाने की इक प्रक्रिया हैं तो विरह के बाद सारी गलतियां और अनकही बातें ही क्यों याद रहती हैं? खैर ये कुछ सवाल हैं जो उपजते हैं इन कहानियों को पढ़कर पर जवाब शायद नहीं मिलते क्यूँकि शायद इनका कोई एक जवाब हो नहीं सकता | इन सब के अलावा सामाजिक जटिलताओं और पारिवारिक समस्याओं का भी अनुपात इस लघु उपन्यास में मिलता हैं | कहानी का कोई एक निष्कर्ष अभी नहीं होता | वो बदलता हैं श्रोता के पूर्व ज्ञान, परिस्थिति और अनुभवों के हिसाब से |
"हमेशा अँधेरे को चीर कर आगे बढ़ने, समाज-व्यवस्था को बदलने और मानवता के सहज मूल्यों को पुन: स्थापित करने की ताकत और प्रेरणा दी है। चाहे उसे आत्मा कह लो, चाहे कुछ और। और विश्वास,साहस, सत्य के प्रति निष्ठा, उस प्रकाशवाही आत्मा को उसी तरह आगे ले चलते हैं जैसे सात घोड़े सूर्य को आगे बढ़ा ले चलते हैं।'"
4. कितने पाकिस्तान
इस किताब की भूमिका में कमलेश्वर ने लिखा की वक़्त ही इस उपन्यास का नायक भी हैं, महानायक भी हैं और खलनायक भी |ये उपन्यास समय की सीमाओं को लांगता हुआ और पारम्परिक कहाणीकरण और परिपेक्ष को पीछे छोड़ता हुआ इतिहास के अनेकों मुद्दों पर आपका ध्यान केंद्रित करता हैं और निरपेक्ष निर्णय सुनाता हैं | सारी घटनाएं एक अदालत में होती हैं जहाँ इतिहास के कई प्रसिद्ध व्यक्तियों को कटघरे में लाया जाता हैं | प्रोमिथेउस से लेकर औरंगजेब को, हिटलर से लेकर स्टालिन को, मौन्टबेटन से लेकर जिन्नाह को | और लाया जाता हैं उन कई अनाम लाशो को जो मरते आये हैं, शहीद होते आये हैं सियासी और धार्मिक मुठभेड़ों की वज़ह से | यहीं नहीं उन लाशों का मानवीकरण भी होता हैं और उनके सवाल भी सामने रखे जाते हैं |ये दिखाया गया हैं की भगवान के नाम पर, धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, सियासत के नाम पर, विचारधाराओं के नाम पर न जाने कितने विभाजन हुए हैं, कितने पाकिस्तान बने हैं और शायद आगे भी बनेंगे |ये शुरू होता हैं देवों और पुराणों से पर फिर भी आज की परिस्थिति में भी उतना ही सटीक बैठता हैं |अदीब और अर्धली मुख्य किरदार हैं और फिर जुड़ती हैं अनेकों ऐतिहासिक घटनाएं और जुड़े पात्र, पात्र ग्रीक देवताओं, राजा गिलगमेश, ऋषि गौतम, सुमेरियन सभ्यताओं से होता हुआ, भारत और संसार के पूरे इतिहास में हर नामी इंसान का जिक्र होता हैं | जिक्र होता हैं देवों और इंसान के युद्ध से लेकर उन तमाम युद्धो का जिनमें कोई नहीं जीता पर मानवता सदैव ही हारी हैं | नैटो से लेकर हिरोशिमा, बाबरी मस्जिद से लेकर भारत की आज़ादी, सांप्रदायिक दंगे, विभाजन और द्विदनांक दौर का पूरा विस्त्रित ब्यौरा किया गया हैं |इसमें बूटा सिंह और जैनिब की कहानी हैं, सुल्ताना और अदीब की कहानी हैं|कहानी हैं उन कई बेगुनाहों की, शाषकों के महत्वाकांक्षाओं की, कई प्रसिद्ध लोगों के अपराधों की, लोगों में नफ़रत घोल रहे सियासत की, कहानी हैं आगे के विभाजनों को रोकने की आस की क्यूँकि आख़िर में पछतावा मानव हैं इतिहास नहीं |
5. गुनाहों का देवता
ये कहानी चन्दर और सुधा की हैं और उनके पवित्र और निस्स्वार्थ प्रेम की, आज की भाषा में प्लेटोनिक लव की जो कि लगभग विलुप्त हैं | चन्दर अपने गुरू और प्रोफेसर के साथ रहता हैं और उनकी बेटी सुधा से प्यार का आभास तब होता हैं जब उसकी शादी तय हो जाती हैं और वो विदा हो जाती हैं |वह प्रेम और नैतिकता के द्वन्द में फंस जाता हैं और सुधा को रोक नहीं पाता |विरह की पीड़ा और गुनाहों के बोझ में दबता ही चला जाता हैं |जब तक सुधा सामने रही कभी उसे यह मालूम नहीं हुआ कि सुधा का क्या महत्त्व हैं उसकी ज़िन्दगी में और जब वो दूर हो जाती हैं तो वह देखता हैं कि वो साँसों से ज्यादा आवश्यक थी ज़िन्दगी के लिए |ये कहानी जितनी सुधा की हैं उतनी ही पम्मी की भी और उतनी ही बिनती की भी | अपनी भावनाओं को भुलाने के लिए वो पम्मी से जा मिलता हैं और उस प्रेम से रूबरू होता हैं जो जिस्मानी हैं मगर तब भी उसकी चेतना कुछ और तराशती हैं |उधर सुधा जो एक हंसती खेलती ज़िन्दगी जी रही थी वेदना और संताप के बादलों से घिर जाती हैं और उसके कहे शब्द उसपर ही लागू हो जाते हैं , 'कैफ बरदोश बादलों को न देख, बेखबर तू न कुचल जाये कहीं '|कहानी के शुरू और आखिर की तुलना मन को क्षीण कर देती हैं | ये उपन्यास प्रेम के हर रूप, भावना और परीकाष्ठता का बहुत सजीव और वास्तविक चित्रण करती हैं |





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