Friday, 5 June 2020

एक मुलाक़ात ( 2020)


जून 2020
10:00 am
दिल्ली

घर में अचानक से कुछ शोर सा होने लगा|सिरहाने के पास रखे फ़ोन को स्नूज़ ऑफ़ करके मैं अलसायी सी लेटी रही|किचन में कड़ाही में माँ शायद कुछ तल रही थी|कोई मेहमान आया होगा शायद |सार्थक पूरे घर में चहलकदमी कर रहा था|बीच में मेरे कमरे के सामने रुक कर बोला की रचित भैया आये हैं|मैंने ये सुना पर कुछ देर तक मन में अंकित नहीं कर पायी|जब अंकित हुआ तो मैंने चादर समेटी और अब अपना मुँह ढक लिया|बस दम साध के पड़ी रही|माँ किचन से कुछ हाथ बटाने को आवाज़ लगा रही थी|मैं सब अनसुना किये बस लेटी रही|एक अजीब सा तूफ़ान अंदर उमड़ रहा था |हज़ारो तस्वीरे चेहरे के सामने आ रही थी | हज़ारो सवाल थे जो मन लगातार दोहरा रहा था फिर कमरे की तरफ बढ़ते क़दमों की आवाज़ सुनाई दी|

"ये रही भैया, दिन भर कुम्भकरण जैसी सोई रहती हैं " कहकर शायद सार्थक चला गया |
मैंने चादर हटाकर बाहर देखना चाहा मगर हिम्मत नहीं हुई | मैं बस लेटी रही ये सोचकर की उठ कर करुँगी भी तो क्या बात करुँगी|  बगल के फ्लैट में जो कीर्तन चल रहा था वो भी बंद हो गया |डी डी ए फ्लैट्स में ऐसे ही होता हैं|एक घर की आवाज़ दूसरे घर में जा रही होती हैं|अब कमरे में सन्नाटा था, पांच मिनट गुज़र गए थे|पर तुम थे कमरे में ये पता था मुझे|तुम पास होते हो तो एक अजीब सी अनुभूति होती हैं ,साँसे थोड़ी रुक रुक कर आती हैं,जैसे अगर कोशिश की तो रुक जाएंगी शायद | जब रहा नहीं गया तो मैंने कनखनी से झाँक ही लिया| तुम खड़े थे दरवाज़े से टिककर|कमरे में ऐसे नज़र घुमा रहे थे जैसे पहली बार देख रहे हो |कुछ सपना सा था ये सब|अंदर का जो उफ़ान था वो गले तक भर आया था |मम्मी चाय के कप लेकर आ गयी|अब तो उठने के अलावा कोई चारा नहीं था|उठकर मैंने सीधे चाय का गिलास पकड़ा और नज़र झुकाये उसमे झाँकने लगी |भाप से चश्मे के सामने सब धुंधला सा पड़ गया था|पर फिर भी नीचे नज़र टिकाये बैठी रही |

मम्मी ने कहा, " देख रचित आया हैं इतने दिनों बाद|ये लोग अपना फ्लैट बेच रहे हैं, हमेशा के लिए|बैंगलोर शिफ्ट हो रहे हैं|उठ जा और आंटी से भी मिल आ जल्दी|"
अब रचित की तरफ मुड़ कर बोलने लगी, "बेटा तुम भी बंगलौर जाओगे या वापस अमेरिका |"
"आंटी अमेरिका नहीं यूरोप, फ्रांस| वैसे अभी कुछ दिन बंगलौर में काम हैं, उसके बाद जाऊंगा |"
" अरे मुझे लगता था अमेरिका में हैं | अब हमें क्या पता हमारी तो सारी उम्र कट गई दिल्ली में |" मम्मी ने खुद ही पर हँसते हुए बोल दिया फिर मेरी तरफ देख कर कहने लगी, " नींद में ही हैं क्या अभी भी, कुछ बात क्यों नहीं करती, रोज़ पूछती रहती थी, रचित कब आएगा, जब आया हैं तो कुछ बोल नहीं रही |"

 मैंने झिड़क कर बोलना चाहा मैं कब बोलती थी पर मम्मी जा चुकी थी कमरे से|तुमसे नज़र मिली|मैंने जल्दी से आँखे फेर ली| पर तुम अभी भी देख रहे हो मुझे,ये जानती हूँ|बाहर से मूवर्स एंड पैकेर्स की आवाज़ आ रही हैं और उसी के बीच में दबे दबे सुनाई दे रहे हैं  रेडियो पर बजते गीत के बोल; 'ऐसे न देखो, जैसे पहले कभी देखा ही नहीं; मुझे कुछ भी नहीं चाहिए तुमसे, न दिलासा, न भरोसा.... '|

शायद आधे घंटे में चले जाओगे तुम|तुम और वो सारा सामान जो जितना तुम्हारा था उतना शायद मेरा भी|मैं सोचने लगी कि आख़िर क्या क्या जा रहा होगा| वो पुरानी अलमारी जिसकी वो बड़ी सी चाभी तुम्हारी नानी हमेशा कमर में बांधे रहती थी ; जिसे चोरी से हम दोनों ने खोल कर देखना चाहा था तो अंदर कुछ नहीं बस कंगन, एक साड़ी और उनकी बचपन की एक ब्लैक एंड वाइट तस्वीर मिली थी हमें|वो स्टडी टेबल भी जा रहा होगा जिसपर ग्रुप स्टडी के नाम पर कॉमिक्स पढ़ा करते थे और कॉपी के आख़िरी  पाने पर न जाने कौन से खेल खेलते थे|वो सारी किताबें भी जा रही होंगी जो तुम्हारे लिए आती थी पर जिन्हें पढ़ती मैं थी|वैन गोग की वो तस्वीर भी जो तुम कहते थे तुम उससे अच्छी बना लेते| ये सब सोचना बेमतलब था मगर मैं करती भी तो क्या|ये आधे घंटे जो अब बचे थे ये स्मॉल टॉक के लिए बहुत लम्बे थे और पिछले पांच साल का हिसाब मांगने के लिए बहुत कम |

"अभी भी चश्मा पहन कर सो जाती हो?" रचित ने पूछा|
मैंने धीरे से हम्म कर दिया और गीली आँखे छुपाने के लिए नज़र नीची कर ली|तुम्हारे एक जूते का फीता बँधा नहीं हैं|हमेशा के जैसे मोज़े नहीं पहने तुमने| नये जूते हैं, काट रहे हैं शायद जो जगह जगह बैंड ऐड लगा रखे हैं तुमने|कितना अजीब हैं न कैसे बहुत समय तक न पहने गए जूते को फिर पहनते हैं तो वो पहली बार की तरह ही काटता हैं|शायद अपने परिवर्जन का बदला लेता हैं|क्या वो बीता पुराना सब भूल जाता हैं? शायद बहुत वक़्त के बाद कुछ पहचाना हुआ मिलना पीड़ा ही देता हैं |

"मुझसे गुस्सा हो संध्या?"
"नहीं, होना चाहिए क्या?"
तुम कुछ बोलना चाहते हो पर रुक गए हो| तुम अब बस देख रहे हो बारी बारी से कमरे की दीवारों को, मुझको और शून्य को | ख़ामोशी की अपनी एक आवाज़ होती हैं|लेकिन वो आवाज़ परिस्थिति के हिसाब से अपना सुर बदल लेटी हैं|याद हैं जब सातवीं क्लास में मैंने स्वाति का रजिस्टर फाड़ कर फेंक दिया था क्यूँकि उसमें रचित लव्स स्वाति का परसेंटेज निकाला हुआ था |इससे पहले कि मैं मैडम से गलती कंफेस्स करती तुमने कह दिया कि तुमसे गुम हो गई रजिस्टर| तुम पूरे पीरियड क्लास में चेयर बने खड़े रहे और मुझे देखते रहे| चुप चाप कितनी बातें कर ली थी आँखों ने|कितनी मधुर थी वो ख़ामोशी|मगर अभी की जो ख़ामोशी हैं उसकी आवाज़ इतनी कड़वी और तीव्र हैं कि मुझे बस अब इसके टूटने का इंतज़ार हैं |

तुम उठ कर कमरे में चलने लगे | कमरे का ऐसा ब्योरा ले रहे हो जैसे भूल गए पाँच सालों में | मेज़ पर पड़े ग्लोब को बेख़याली में घुमा दिया तुमने | फिर शेल्फ़ पर पड़ी किताबों को देखने लगे | एक एक करके बस उन्हें उठा के देख रहे हो और पलट रहे हो |
 एक हाथ में मुराकामी और दूसरे में दोस्तोयेव्स्की|किताबों से कोई मतलब नहीं हैं तुम्हें |मुझे पता हैं तुम क्या ढूंढ रहे हो|

"वो जो बुकमार्क था वो..... "
"फेंक दिया मैंने|" अमूमन ही थोड़ा झेंप कर कहाँ मैंने |
"क्यों मगर.. " तुमने बुझी आवाज़ से पूछा |
'पुराना ही गया था, एक सिरे से फटने लगा था तो फेंक दिया|चीज़ो को समय समय पर बदल देना चाहिए न, तुमसे ही सीखा हैं |" तुमने नज़रे झुका ली | किताबों को जगह पर रखने लगे | आकर बिस्तर पर बैठ गए मेरे पैरों के पास |

" मैंने बहुत ग़लत किया हैं सैंडी | आई ऍम रियली सॉरी |"
" ये करने की जरुरत नहीं हैं तुम्हें "
" नहीं, हैं;बिल्कुल हैं | मैं बहुत बुरा इंसान हूँ | मैं जब कॉलेज गया तो थोड़ा लेट ज्वाइन किया मैंने, सब आगे बढ़ गए थे | नये लोग थे, अंजान देश था |रोज़ घंटो पढ़ना पड़ता था | मैं बहुत उलझ गया था |जब भी तुम्हारा कॉल  उठाता था तो बहुत वक़्त निकल जाता और वापस पढ़ने का मन भी नहीं..... "
" मत करो ये सब, प्लीज़ | "
"क्या मैं बस.."
" मुझे नहीं सुनना ये सब रचित | इतने सालों बाद अचानक एक दिन बिना बुलाये आओ और दो चार बातें बना के ऐसा जताओ कि कि सब इतनी छोटी बात ही तो थी,  मजबूरी थी तुम्हारी, नहीं?मुझको ये सब तब समझाया होता तो नहीं समझती क्या मैं? खुद से और मुझसे झूठ मत बोलो| कुछ नहीं भी हैं तो ये एक नाराज़गी ही सही जिसे लेकर आगे बढ़ गई मैं | मुझसे ये भी मत छीनों | फिर कुछ भी नहीं बचेगा मेरे पास |"
" मैं बहुत बुरा इंसान हूँ संध्या, तुम्हें डेसेर्वे नहीं करता,  तुम मुझसे बहुत अच्छा...
" सिम्पथी नहीं चाहिए मुझे,  ख़ुश हूँ मैं.. बहुत | तुम्हारे जैसे बहुत बड़ा कॉलेज नहीं हैं मेरा, तुम्हारे जितने बड़े ख़्वाब नहीं हैं |पर तुम्हारी तरह मैं सच से भागती नहीं हूँ | रिश्तों की शेल्फ़ लाइफ अपने आराम के मुताबिक तय नहीं करती | तुम्हारे जैसे ऐसे वादे नहीं करती जो पूरे न करूँ| सॉरी ही बोलने आये हो न, अब बोल दिया, तो फिर चले जाओ अब|" ये बोलकर मैं काँपने लगी | बोला क्या शायद चीखा ही होगा | तुम डर गए हो मुझे ऐसा देख कर | कभी ऊँची आवाज़ में बात करते हुए नहीं सुना तुमने और आज ये हिस्टीरिया देख लिया| लाज़मी था तुम्हारा हैरान होना | पर इस खीज़ का उदगम क्या था ये मुझे नहीं पता था |मुझे आईने में अपना नितांत प्रतिबिम्ब दिखा | ऐसे क्यों बोल दिया मैंने? तुम्हारी पूरी बात तक नहीं सुनी|

मम्मी कमरे में देखने आ गई कि सब खैरियत हैं कि नहीं| हमें देख कर थोड़ी असहज हो गई शायद |
" रचित कचौड़ी बनाई हैं तेरे लिए, ले आऊं? "
"आंटी देर हो जाएगी वो निकलना हैं कुछ देर में |"
"पैक कर देती हूँ बेटा फिर, अच्छा " कहकर मम्मी चली गई |

तुम फिर कुछ नहीं बोले |बस मेरे पैरों पर हाथ रख दिया | जैसे माफ़ी मांग रहे हो | याद हैं एक बार जब तुम ढंग से स्कूटर चलाना नहीं सीखे थे पर फिर भी मुझे बिठा कर ले गए थे घुमाने | कितनी बुरी तरह एक्सीडेंट हुआ था, हेलमेट भी नहीं पहना था मैंने| तब जब हॉस्पिटल में तुम मिलने आये थे तब भी ऐसे ही हाथ रखा था पैरों पर और कितना रोये थे | आँखों में वहीं चमकते बूँद फिर से आ गए हैं तुम्हारे|पर मैं पहले की तरह गले लगकर शांत नहीं करा रही तुम्हें |आखिर क्या रोक रहा हैं मुझे? पिछले पांच साल;मेरे वो सारे कॉल्स जो तुमने उठाये नहीं ; सारे मैसेज जिन्हें देखकर उनका  ज़वाब लिखना जरुरी नहीं समझा तुमने; सोशल नेटवर्किंग पर दिखी उन तमाम लड़कियों की तस्वीरें जिनके कंधों पर हाथ डाले फोटो थी तुम्हारी;या सिर्फ मेरा अहंकार जो अब क्षीण हो गया था तुम्हें ऐसा देख कर|

इतना कुछ बोलना चाहती हूँ पर फिर भी मौन हूँ |खुल कर रोना चाहती हूँ मगर जज़्बातों के बांध को कसकर पकड़ रखा हैं मैंने पता हैं कि एक बार पकड़ छूटी तो काबू नहीं रहेगा मेरा खुद पर|लग रहा हैं अब बहुत देर हो गई हैं | अब थक गई हूँ मैं |तुम तक हाथ बढ़ाया हैं मैंने|तुम्हें हल्के से छू ही लेने को|पर हाथ तुम तक नहीं पंहुचा|सार्थक कुछ खाने का सामान लेकर आ गया हैं और तुमसे न जाने क्या क्या बोले जा रहा हैं, खिलाये जा रहा हैं| मैं कुछ नहीं सुन रही हूँ ;बस देख रही हूँ तुम्हें | तुम सार्थक की बातों का जवाब भी दे रहे हो और दर बदर मुझे भी देख रहे हो, सवाली नज़रो से| कुछ तराश रहे हो मेरी आँखों की गहराईयों में | लेकिन न तो मेरी छोटी ऑंखें इतनी गहरी हैं और न तुम्हें टीस के अलावा इनमे कुछ दिखाई देगा अभी|

जाने का वक़्त हो गया हैं| घड़ी की टिक टिक एक चोट जैसी प्रतीत हो रही थी |न तो कोई जवाब ही मिले और न तुम्हारा स्पर्श ही |एक पल को लगा की वक़्त यहीं रुक जाये और ये जो लोग आ गए हैं आस पास कुछ देर को अकेला छोड़ दे हमें बस|ऐसा करके क्या होगा मुझे नहीं पता, क्या बोलूंगी जानती नहीं, क्या करुँगी मालूम नहीं |उठकर दरवाज़े की तरफ जाने लगे हो तुम पर मुड़ कर देख रहे हो बार बार|अब के जब जाओगे तो वापस कब लौट कर आओगे|यादों के बोझ को थोड़ा और भारी कर दिया हैं| मेरी अनिश्चिंताओ को थोड़ा और प्रखर| बस अब जाने की इजाज़त मांग रहे हो जैसे तुम | हाथ भर गया हैं तुम्हारा माँ और भाई के दिए सामान से| ऐसे ही मिलना लिखा था क्या?

एक उपन्यास तुम वापस रखना भूल गए हो | या जान बुझ कर खुला छोड़ गए हो | फौंटैनहेड |हर कहानी जो तुम्हें सुनाती थी उसका उपहास करते थे तुम, सिवाए इसके| जब ये नॉवेल सुनाई थी तुम्हें तो एकदम गंभीर होकर बोले थे तुम कि आर्किटेक्ट बनोगे|खुद से दोबारा पढ़ गए थे फिर से ये नॉवेल| उस दिन नहीं ठानी होती तो शायद नहीं गए होते न इतनी दूर पढ़ने| यहीं कमरे में बैठे मैं जबरदस्ती कोई और कहानी सुना रही होती तुम्हें| ये यदिवाद का चक्रव्यूह कितना ख़तरनाक होता हैं|यदि ये होता, तो वो होता| वो नहीं होता तो कितना अच्छा होता|

तुम अब ओझल हो गए हो हो आँखों से |मैंने खुली किताब को बंद कर दिया| एक पल के लिए उसे फाड़ डालना चाहा|उस कुर्सी पर आँखे मूँदकर बैठ गई जहाँ तुम बैठे थे|फिर न जाने क्यों उठकर तुम्हारे फ्लैट जाने को उठी| सब खाली था, कोई नहीं था|  दीवारें पहचान में नहीं आ रही थी | लगा कि जैसे खो गई हूँ, मैं भी और मेरा बचपन भी|बॉलकनी से नीचे देखा तो सब थे पर  तुम नहीं दिखे |
"नानी की अलमारी नहीं जा पायी बाक़ी सामान के साथ, बहुत भारी हैं और पुरानी भी | माँ आंटी को बेच देने को बोल गई हैं, मगर तुम देखना अगर.. "
"ठीक हैं " मैंने चाभी लेते हुए कहा |
"हो सके तो माफ कर देना संध्या |अब जाना होगा "कह कर जाने लगे | मैंने रोका तुम्हें और नीचे झुक कर जूते के फीते बांध दिए |
" कब तक मैं बांधूंगी| सीख लो वरना गिर जाओगे कभी |"
" तुम नहीं थी न इतने साल, देखो गिर ही तो गया हूँ |"


2 comments:

  1. I skipped my heartbeat while reading last lines🖤 beautiful!!
    यार से छेड़ चली जाए 'असद'
    गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही।

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  2. Thank you so much for these words.😇

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