Friday, 5 June 2020

एक मुलाक़ात (2015)


जुलाई 2015
4:00 am
दिल्ली

रात में शायद बहुत बारिश हुई हैं |छत पर जगह जगह पानी भर गया हैं |मैं पाँव दबा के चल रही हूँ फिर भी फिसल जा रही हूँ | तुम सहारा देने के बजाय बॉलकनी से टिक कर खड़े हँस रहे हो मुझे देख कर|आसमां धीरे धीरे रंग बदल रहा हैं...संतरी...लाल...गुलाबी|मानों ये आसमान कोई कैनवस हो और मौसम कोई चित्रकार |

"आंटी को क्या बोल कर आई? "
"सो रही थीं, पूछेंगी तो बोल दूंगी योगा करने गई थीं "
"छत पर बाढ़ आई हुई हैं, करो...ज़रा मैं भी देखता हूँ कैसे करोगी योगा "
"बोल दूंगी तुमसे मिलने आई थीं...आखिरी बार ही तो हैं...थोड़े न डाँटेंगी फिर "
"आखिरी बार क्यूँ? ऐसे नहीं बोलते | सर्दियों में तो फिर आना हैं "
" सारा सामान रख लिया हैं न?  कुछ छूटा तो नहीं न? "
"अरे छूट गया न... "
"क्या? जाओ रख लो जल्दी से  "
"तुम छूट गई... बताओ कौन से सूटकेस में बैठना चाहोगी "
" सूटकेस में क्यूँ बैठूंगी भला मैं? दिसंबर में जब आओगे तो तुम्हारे साथ चलूंगी न घूमने...पूरा यूरोप "
" बस यूरोप... कहीं और नहीं.. मैं तो घूम चुका होंगा तब तक "
" अरे तो उससे क्या | घूमाना पड़ेगा मुझे | बाक़ी जगह अगली छुट्टियों में... ठीक "
" हम्म...ठीक " तुमने कहाँ और लकड़ी की सीढ़ी बरसाती छत से टिका कर मुझे ऊपर चढ़ने का इशारा किया |

" पर कुछ देर बाद निकलना हैं तुम्हें " मैंने गैरदिलचस्पी से कहा|
" कुछ देर तो हैं न " तुम बोले और ऊपर चढ़ने लगे |
ऊपर से सब कुछ और ज्यादा सुन्दर लग रहा हैं | तुम बिना पलक झपके सूर्योदय देख रहे हो | साथ ही देख रहे हो आस पास के घर... पेड़... मेट्रो के पुल...बिल्कुल एकाग्र होकर | कभी कभी लगता हैं कि तुम्हारे दृष्टिकोण से एक बार सब कुछ देखूँ...  तुम्हारे हिसाब से कुछ मायनों को समझूँ... बस एक बार तुम्हारे अंतर्मन में झाँक कर सब जान लूँ |

"लोग इतने छोटे घरों में कैसे रह लेते हैं सैंडी?...सारी ज़िन्दगी "
"क्यूँ, छोटे घरों में क्या बुराई हैं? हमारे फ़्लैट्स भी तो छोटे से हैं "
"तभी तो निकलना हैं मुझे यहाँ से | हम न अपना घर बहुत बड़ा बनाएंगे...बड़े कमरे...बड़ी छत...बड़ा सा बगीचा... क्या कहती हो? "
" मुझे क्या कहना,  बनाना तो तुम्हें हैं... आर्किटेक्ट तो तुम हो न "
" अरे रहना तो तुम्हें भी हैं न, बताओ कैसा घर चाहिए, वैसा बना दूंगा "
"मुझे बड़ी चीज़े इतनी पसन्द नहीं हैं | मुझे छोटी चीज़े अच्छी लगती हैं | जैसे कि ये सूर्योदय मुझे इतना हैरान नहीं करता... बहुत बड़ा और हाईप्ड लगता हैं ये मुझे| मुझे हैरान करती हैं वो रेलिंग पर क्रम से लटकी बूँदे...जिनपर जब सूरज की रौशनी पड़ेगी तो सुर्ख़ चमकने लगेंगी और उंगलियों फिराने पर आपस में मिल जाएंगी | मुझे हैरान करता हैं छोटा सा घोंसला जो वो उस दिवार की दरार में बना हुआ हैं | हैरान करते हैं ये छोटे दाने जो कुछ गिलहरी ने खा लिए और कुछ यूँ ही बिखेर दिए | "
"बाप रे ! चलो न मेरा, न तुम्हारा... कुछ मीडियम सा घर देख लेंगे "

" सुनो, घर के दरवाज़े न गोल बनाना...और स्पाइरल वाली सीढ़ियाँ "
"गोल दरवाज़े कहाँ होते हैं? "
" मेरे घर में होंगे... सारी दीवारें न मैं खुद पेंट करुँगी... और हम बिस्तर के बजाये न बहुत सारे गद्दे लगा देंगे ज़मीन पर कतार से "
" बहुत सारे क्यूँ... कितने बच्चें करने का इरादा हैं मोहतरमा? "
" बच्चों के लिए नहीं... मेरे लिए होगा...मैं नींद में बहुत घूमती हूँ न तो एक सिरे से दूसरे सिरे लुढ़कते रहूंगी नींद में...वरना गिर गई तो... रात भी गिरते गिरते बची थीं  "
" मैं तुम्हें जकड़ कर सोयुंगा तो इसकी नौबत ही नहीं आएगी" तुमने कह गये हो बेख्याली से शायद | मैं इन बेख्याली में छिपी प्रगाढ़ता ढूंढ रही हूँ...अब शायद कल्पना भी कर रही हूँ |

" कुत्ता रखेंगे या बिल्ली? " तुमने पूछा हैं |
" एक कुत्ता और तीन बिल्लियाँ "
"तीन क्यूँ? "
"वरना बोर हो जाएंगी न वो... अपने जैसा कोई चाहिए होता हैं "
"तो फिर कुत्ता एक क्यूँ? "
"उसके लिए तुम हो न "
"अच्छा जी " तुमने मेरे हाथ पकड़ कर कोहनी मोड़ दी हैं |
" मुझे न एक कोआला बियर भी चाहिए वैसे...और एक कछुआ... हो सके तो एक हाथी भी "
" ऐसा करते हैं जंगल में ही चलते हैं... हाथी पर घूमेंगे...जानवरों से बातें करेंगे... तुम लकड़ियाँ चुनना... मैं भेड़ चरा कर आऊंगा... और शिकार पकड़ कर "
"पागल हो क्या... मारना नहीं हैं किसी को"
"तुम पागल हो क्या...जो सोच भी रही हो ये सब... वैसे पागल तो हो तुम "
"अभी तो खुद पूछ रहे थे बताने को... अब मज़ाक़ बना रहे हो " मैं मुँह फुलाकर बैठ गई |
" अच्छा सुनो मेरे दिमाग में न एक नाम आया हैं... संचित ( संध्या- रचित )...  कैसा नाम हैं "
" बहुत बकवास नाम हैं " मैं दूसरी तरफ देख कर अपनी मुस्कुराहट छुपा रही हूँ | थोड़ी देर भी गुस्सा नहीं रहने देते न मुझे तुम  |

"एक घंटा बचा हैं संध्या...क्या करें? " तुम मोबाइल देखते हुए बोलते हो|
" कहानी सुनते हैं...यादों का इडियट बॉक्स "
तुमने ईरफ़ोन निकाल लिए | दाहिने वाला मेरा...मुझे उस कान से उससे ज्यादा सुनाई देता हैं | कहानी में जो नायक होता हैं वो भी नायिका को छोड़ कर जा रहा होता हैं | कहानी फ़्लैशबैक में चल रही हैं सो पता हैं कि अब ये वापस नहीं मिलेंगे | बीच में गाना बजने लगा हैं अब | 'हम तुम कितने पास हैं कितने दूर हैं चाँद सितारे...सच पूछो तो मन को झूठे लगते हैं ये सारे... मगर सच्चे लगते हैं... ये धरती... ये नदियाँ... ये रैना.. '
"और?  " मैं चहक कर पूछती हूँ और सवाल में आँखे उठाती हूँ |
तुम मुझे देखकर हँस देते हो |

मैंने ईरफ़ोन निकाल दिए हैं और अब दूर जाती मेट्रो ट्रेन को देख रही हूँ... तुम मुझे एकटक | मैं बेखबर बनकर सूरज को देख रही हूँ वो बादलों के पीछे से हट कर अब प्रकाशित कर रहा हैं उन बूँदो को |सुन रही हूँ चिड़ियों को कहकहाते हुए... शहर को जागते हुए |अब तुम्हारी तरफ देख कर वहीं गाना गुनगुना रही हूँ|
"तुम इन सब को छोड़ के कैसे आज सुबह जाओगे...  मेरे साथ इन्हें भी तो तुम याद बहुत आओगे "

तुम्हारी आँखों में कुछ बूँदे चमकने लगी हैं उन बाक़ी बूँदो की तरह | तुम सिसक रहे हो | फ़ोन एक कोने में रख दिया हैं तुमने | कभी और सुन लेंगे उस कहानी को | कहना सही नहीं होगा पर जब तुम रोते हो न तो बहुत अच्छा लगता हैं | कभी कभी मन करता हैं बस किसी तरह रुला दूँ तुम्हें...फिर शांत करा दूँ आलिंगन में भर कर... तुम्हारे साथ मैं भी रोती रहूँ और मनाती रहूँ... इकठ्ठा कर लूँ तुम्हारा हर आँसू... किसी कमाई हुई पूंजी की तरह |

" पापा ने अचानक से टिकट करवा दी | परसों जाना तय हुआ था पहले तो | देखों तुम्हारे लिए कुछ ला भी नहीं पाया " तुम कुछ देर बाद बोले |
"कोई बात नहीं.. क्या फ़र्क़ पड़ता हैं "
"पड़ता हैं...कुछ तो होना चाहिए न जिससे याद रखा जा सके कोई ख़ास पल... सोचा था तुम्हें एक नॉवेल लाकर दूंगा "
अचानक कुछ याद आता हैं तुम्हें | तुम अपना वॉलेट खोलते हो |

"पैसे नहीं चाहिए मुझे "
" दे कौन रहा हैं तुम्हें | रिश्तेदारों जैसे तोहफ़े थोड़े दूंगा "
तुमने मेट्रो कार्ड निकाला और बगल में पड़े इक नुकीली कील से उसपर खुरचने लगे | बच्चों के जैसे 'एस❤️आर ' लिख दिया हैं तुमने उस कार्ड पर | और मेरे हाथों में थमाकर बोलते हो, " नॉवेल नहीं तो बुकमार्क सही...छोटी चीज़े पसंद हैं न तुम्हें"| मैंने कसकर पकड़ लिया हैं वो बुकमार्क भी और तुम्हारा हाथ भी |

" इतनी ज़ोर से क्यूँ पकड़ लिया हैं हाथ... कहीं भाग थोड़े जाऊंगा "
" मुझे क्या पता? भाग गये तो?  वापस ही नहीं आये तो... वहाँ किसी फिरंग को पटा लिया तो? "
" हाँ अब तो सोच रहा हूँ भाग ही जायूँ और वहीं कोई ढूंढ लूँ | इतनी दूर जा रहा हूँ... ये नहीं कि मुझे कुछ कोई तोहफ़ा ही दे दो " तुमने अट्ठहास करते हुए कहा |

 मगर मुझे ये बात कुछ ख़ास पसंद नहीं आई | मैं ढूंढ रही हूँ अपने आस पास कि कोई चीज़ जुगाड़ लूँ | इतना वक़्त भी नहीं बचा हैं कि कुछ खरीद ही आयूं | घर में कुछ ढूंढ़ने गई तो वक़्त ज़ायर हो जायेगा...मम्मी सवाल करेंगी वो अलग | और इस छत पर दुनिया भर के कबाड़ के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता | तुम हँस रहे हो मुझे ऐसा तड़पता देख कर |
" औ... कुछ नहीं मिल रहा क्या? " तुम कांधे पर हाथ रख कर पूछते हो | मैं तुम्हारा हाथ झिटक देती हूँ |
" नाक पर गुस्सा रहता हैं तुम्हारे" बोलकर फिर हँसने लगते हो |

"अरे अपने बाल क्यूँ नोच रही हो...आओ मदद कर दूँ थोड़ी " छेड़ते हुए बालों से खेलने लगते हो तुम | तोड़े हुए सारे बाल इकठ्ठा करके तुम्हारी ऊँगली पर लपेट कर बांध दिए हैं मैंने | तुम विस्मय से देख रहे हो मुझे | मैं तुम्हारी अनामिका पर बँधी उस कागज़ी गिरह को देखे ख़ुश हो रही हूँ |

"ल्यूफोक" मुझे देखकर तुम बोले |
" क्या? "
" पागल...फ्रेंच में इसका मतलब पागल होता हैं "
" मुझे फ्रेंच नहीं आती...चुप चाप हिन्दी में बात करो "
" लैंग्वेज नहीं आती न... फ्रेंच और भी होता हैं कुछ... वो आता हैं "
" हटो चुप चाप... और हाथ छोड़ो मेरा "
" ये कैसी अँगूठी हुई भला "
" मैंने कह दिया तो हो गई | अब बांध लिया हैं मैंने तुम्हें | कहीं नहीं भाग पाओगे तुम...चाह कर भी "

"ज़्यू तेम ( आई लव यू ) " तुमने कुछ ठहर कर फ्रेंच में कहा |
" बोला न नहीं आती फ्रेंच...क्या मतलब हैं इसका |
तुम चुप रहे... कुछ नहीं बोले | बस दोनों हाथ थामे और कांधे पर सर रखे बैठे रहे | मैंने भी हाथ छुड़ाने की ज़ेहमत नहीं की |
" पागल के लिए ही कोई और शब्द होगा न... आखिर तुम्हें पागल ही तो लगती हूँ मैं..नहीं? " तमतमाते हुए मैं बोली | तुमने और कसकर पकड़ लिया मुझे और कान के पास आकर धीरे से बोले,  "हाँ...पगली हो तुम... मेरी पगली " |


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