नवंबर 2025
6:00 pm
चंडीगढ़
" हाय, कैसी हो? " तुमने गले लगाते हुए पूछा |
मैंने अपनी हथेली से तुम्हें घेरा | इतना धीरे भी नहीं कि स्पर्श न हो और इतना तेज़ भी नहीं कि मेहँदी तुम्हारी शर्ट पर लग जाये |
"सब बढ़िया | तुम बताओ |" मैंने जरुरत से ज्यादा उल्लास से कहा |
"घर पर किसी ने पूछा नहीं कहाँ जा रही हो? "
"पार्लर का बोल कर आ गई | कार वहीं पार्क करवा दी हैं | रिक्शे से आ गई |"
"तुम्हारा काम कैसा चल रहा हैं? "
"बस चल रहा हैं |"
"आंटी नहीं आई? "
"वो कल आएँगी शायद, सीधे शादी में |"
"और तुम? " मैंने धीरे से पूछा |
तुम कुछ नहीं बोले | बस पानी पीने लगे फिर से |
"अरे मैं भूल गया क्या खाओगी? "
"नहीं कुछ नहीं, हाथ सूखे नहीं अभी "
"मैं खिला दूंगा " कहकर तुमने खुद ही आर्डर कर दिया कुछ |
" तुम अभी क्यों कर रही हो शादी, अभी तो कितनी छोटी हो |"
" सत्ताईस साल की हो गई हूँ, मैं भी और तुम भी | ऐसे बचपना क्यों कर रहे हो | कोई असली वजह हैं भी तुम्हारे पास "
" फिर क्या करुँ मैं संध्या | पिछले पाँच साल में जब भी इंडिया आया कभी मिल नहीं पाया तुम से | कभी माँ ने रोक लिया| कभी तुम नहीं आ सकी | अब जब मिल रहे हैं तो ऐसे | मैंने सोचा था... छोड़ो हटाओ अब | हमेशा देर कर देता हूँ मैं | एक कविता थी न ये ; तुमने एक बार सुनाई थी |"
" हम्म...मुनीर नियाज़ी की "
" मुझे पर ही लिखी गई थी शायद... नहीं? हमेशा देर कर देता हूँ मैं.. कोई जरुरी बात करनी हो... कोई...कोई... "
"कोई वादा निभाना हो...उसे आवाज़ देनी हो...उसे वापस बुलाना हो...हमेशा देर कर देता हूँ मैं |"
मेरे हाथ सूख गये थे अब.. पर आँखे भीगी हैं |
" कल आओगे? " मैंने उठते हुए पूछा |
"पता नहीं " तुमने बोलकर आँखे घुमा ली |
मैं बाहर आ गई हूँ, तुम अभी भी अंदर बैठे हो | शीशे से तुम्हें देख रही हूँ | बहुत अंधेरा हो गया हैं बाहर | मैं नहीं दिख रही होंगी तुम्हें | न ही तुम चेष्टा कर रहे हो मुझे देखने की | तुम अब बस वो जूठी कॉफी पी रहे हो |
6:00 pm
चंडीगढ़
प्रेम को मैंने न कभी पूरा समझा हैं और न कभी पूरा लिखा हैं | बस टुकड़ो में जिया हैं, बहती हवाओं से पिया हैं | जब लिखने बैठती हूँ तो कुछ वाक्यों के बाद ही कलम दम तोड़ देती हैं | जब लगता हैं कि अब पूरा समझ गई हूँ इसे, मैं खुद को और ज्यादा विमूढ़ पाती हूँ | मानों की जैसे प्रेम एक बुलबुला हो और मैं एक बच्ची के जैसे उसे पकड़ने की लालसा में पीछे भाग रही हूँ, उछल रही हूँ, अनेक यत्न कर रही हूँ | और उसे पकड़ते ही वो फूट जाता हैं और पूरा संसार एक मिथ्या सा प्रतीत होता हैं |
रिक्शॉ से उतरते वक़्त हाथ के एक कोने की मेहंदी थोड़ी सिमर गई | जैसे तैसे ठीक करके मैं रेस्टोरेंट पहुंची| एक बार एड्रेस दोबारा मिला लिया | शीशे के पार तुम बैठे थे | पानी पिए जा रहे थे और खुद में कुछ कुछ बड़बड़ा रहे थे | मुझे अंदर आते देखा तो पहले कुछ मुस्कुराये मगर मेरे हाथों को देख कर रुक गए |
" हाय, कैसी हो? " तुमने गले लगाते हुए पूछा |
मैंने अपनी हथेली से तुम्हें घेरा | इतना धीरे भी नहीं कि स्पर्श न हो और इतना तेज़ भी नहीं कि मेहँदी तुम्हारी शर्ट पर लग जाये |
"सब बढ़िया | तुम बताओ |" मैंने जरुरत से ज्यादा उल्लास से कहा |
" शादी आज हैं या... "
" कल हैं | आज मेहंदी थी, रात में संगीत हैं |अभी एक घंटे में शुरू हो जायेगा |" आखिरी वाक्य अनावश्यक था पर मैंने शायद जान बूझ कर तुम्हें समय की सीमा का आभास कराया था |
" कल हैं | आज मेहंदी थी, रात में संगीत हैं |अभी एक घंटे में शुरू हो जायेगा |" आखिरी वाक्य अनावश्यक था पर मैंने शायद जान बूझ कर तुम्हें समय की सीमा का आभास कराया था |
"घर पर किसी ने पूछा नहीं कहाँ जा रही हो? "
"पार्लर का बोल कर आ गई | कार वहीं पार्क करवा दी हैं | रिक्शे से आ गई |"
"तुम्हारा काम कैसा चल रहा हैं? "
"बस चल रहा हैं |"
"आंटी नहीं आई? "
"वो कल आएँगी शायद, सीधे शादी में |"
"और तुम? " मैंने धीरे से पूछा |
तुम कुछ नहीं बोले | बस पानी पीने लगे फिर से |
"अरे मैं भूल गया क्या खाओगी? "
"नहीं कुछ नहीं, हाथ सूखे नहीं अभी "
"मैं खिला दूंगा " कहकर तुमने खुद ही आर्डर कर दिया कुछ |
" अरेंज्ड मैरिज? "
"हाँ | कॉलेज सीनियर हैं | कॉलेज में कभी बात तक नहीं हुई| "
"फिर"
"एक ही क्लिनिक में काम कर रहे हैं | कुछ महीनों से | वहीं मिले |कितना अजीब हैं,नहीं? "
" तो पसंद आया तुम्हें? "
"मुझसे पहले मम्मी को आ गया | रोज़ क्लिनिक आने लगी वो| मुझसे मिलने के बहाने राघव से मिलती |"
तुमने सिर हिला कर हामी भरी |
" तुमने बताया नहीं पर कभी इसके बारे में " तुम्हारी आवाज़ में नाराज़गी भी थी और बेबसी भी |
" बताया तो बस चार महीने हुए हैं | कॉलेज में नाम तक नहीं पता था उसका | और पिछले पाँच महीनों में बात भी तो नहीं हुई तुमसे, वो तुम्हारे प्रोजेक्ट के चलते | तुमसे ज्यादा बात तो एंड्रू से हो जाती हैं | "
" हम्म बताता हैं वो | तुम्हें ईव कहता हैं वो | संध्या नहीं बोल पाता न, तो इवनिंग से ईव | तुम्हें फेसटाइम कर करके परांठे बनाना सीख गया वो| " तुम्हारा गला कुछ रुंध गया था अब |
"हाँ | कॉलेज सीनियर हैं | कॉलेज में कभी बात तक नहीं हुई| "
"फिर"
"एक ही क्लिनिक में काम कर रहे हैं | कुछ महीनों से | वहीं मिले |कितना अजीब हैं,नहीं? "
" तो पसंद आया तुम्हें? "
"मुझसे पहले मम्मी को आ गया | रोज़ क्लिनिक आने लगी वो| मुझसे मिलने के बहाने राघव से मिलती |"
तुमने सिर हिला कर हामी भरी |
" तुमने बताया नहीं पर कभी इसके बारे में " तुम्हारी आवाज़ में नाराज़गी भी थी और बेबसी भी |
" बताया तो बस चार महीने हुए हैं | कॉलेज में नाम तक नहीं पता था उसका | और पिछले पाँच महीनों में बात भी तो नहीं हुई तुमसे, वो तुम्हारे प्रोजेक्ट के चलते | तुमसे ज्यादा बात तो एंड्रू से हो जाती हैं | "
" हम्म बताता हैं वो | तुम्हें ईव कहता हैं वो | संध्या नहीं बोल पाता न, तो इवनिंग से ईव | तुम्हें फेसटाइम कर करके परांठे बनाना सीख गया वो| " तुम्हारा गला कुछ रुंध गया था अब |
वेटर खाना रख कर चला गया हैं| तुम प्लेट अपनी तरफ करके खाने से मिर्च के टुकड़े अलग कर रहे हो | थोड़ा भी तीखा बर्दास्त नहीं होता मुझसे, भूले नहीं हो तुम | फिर एक चम्मच लेकर खिला देते हो तुम मुझे | वैसे ही जैसे पहले खिला देते थे | नहीं, पहले तुम जान बूझ कर निवाले में मिर्च का टुकड़ा छुपा देते थे और इतनी शरीफ चेहरा बना कर खिला देते थे | फिर वहीं लड़ाइयाँ और आइसक्रीम से सुलह | " तुम बच्ची हो क्या? खुद अपने हाथों से खाती नहीं हो | और आइसक्रीम से मान भी जाती हो" तुम कहा करते थे | इस वक़्त खाना गटकना एक संघर्ष हैं और तुमसे आँखे मिलाना भी |
" चार महीने काफी होते हैं संध्या? किसी इंसान को जान लेने में "
"होने को तो पूरी ज़िन्दगी काफी नहीं होती "
"मुझे तो जानती हो न तुम | तुमसे बेहतर कौन जानता हैं |जो हूँ, जैसा हूँ, तुम्हारे सामने हूँ |"
" क्या कहना चाहते हो? "
"तुम क्यों कर रही हो ये शादी? "
"क्यों नहीं करनी चाहिए ये शादी? "
"ये राघव मुझे सही नहीं लग रहा "
"सही नहीं लग रहा मतलब? तुम मिले भी हो? "
"फेसबुक पर ढूंढा था,अजीब अजीब पोस्ट शेयर करता हैं, नॉन वेज खाता हैं, फेवरेट नॉवेल में चेतन भगत की कोई नॉवेल हैं, बस तुम्हारे लिए ठीक नहीं हैं "
"उसके बारे में जानते ही थे तो पूछा क्यों पहले?"
"तुम्हें तो वर्ल्ड टूर भी करना था न, तुमने वादा किया था "
"वादा तुमने किया था| खैर अपने पति के साथ ही घूम लूँगी "
तुम्हारे चेहरे पर कुछ नई रेखाएं उभर आई थी | कुछ पीड़ा की थी कुछ ग्लानि की | कुछ अधूरे अहद की, कुछ अधूरे यादों की |
"होने को तो पूरी ज़िन्दगी काफी नहीं होती "
"मुझे तो जानती हो न तुम | तुमसे बेहतर कौन जानता हैं |जो हूँ, जैसा हूँ, तुम्हारे सामने हूँ |"
" क्या कहना चाहते हो? "
"तुम क्यों कर रही हो ये शादी? "
"क्यों नहीं करनी चाहिए ये शादी? "
"ये राघव मुझे सही नहीं लग रहा "
"सही नहीं लग रहा मतलब? तुम मिले भी हो? "
"फेसबुक पर ढूंढा था,अजीब अजीब पोस्ट शेयर करता हैं, नॉन वेज खाता हैं, फेवरेट नॉवेल में चेतन भगत की कोई नॉवेल हैं, बस तुम्हारे लिए ठीक नहीं हैं "
"उसके बारे में जानते ही थे तो पूछा क्यों पहले?"
"तुम्हें तो वर्ल्ड टूर भी करना था न, तुमने वादा किया था "
"वादा तुमने किया था| खैर अपने पति के साथ ही घूम लूँगी "
तुम्हारे चेहरे पर कुछ नई रेखाएं उभर आई थी | कुछ पीड़ा की थी कुछ ग्लानि की | कुछ अधूरे अहद की, कुछ अधूरे यादों की |
" तुम अभी क्यों कर रही हो शादी, अभी तो कितनी छोटी हो |"
" सत्ताईस साल की हो गई हूँ, मैं भी और तुम भी | ऐसे बचपना क्यों कर रहे हो | कोई असली वजह हैं भी तुम्हारे पास "
तुम मौन हो | भाव विभोर होकर सोच रहे हो | शायद कोई एक और बहाना| या सोच रहे हो तुम की क्यों बना रहे हो आख़िर ये बहाने | अवचेतन खाली प्लेट में चम्मच घुमा रहे हो तुम |बीते पाँच सालों में भले ही हम न मिले पर कभी कभी ही सही, बातें होती तो थी हमारी | अटकती अटकती, जेट लैग्ड सी बातें | यू हैव बीन मेल्ड,ब्लू टिक्स, यूँ मे लीव ए मैसेज में उलझी बातें | पर तब इतनी दूर होकर भी लगता था कि कितने पास हो | अभी तुम सामने बैठ कर भी कितने दूर हो |
मैं बार बार घड़ी देख रही हूँ | तुमने अब कॉफी मंगवा ली हैं,मेरे मना करने पर भी; एक्स्ट्रा शुगर के साथ | थोड़ी सी ही पी लेना कहकर |बारह साल पहले, बोर्ड्स के एग्जाम के बाद पहली बार कैफ़े गये थे हम तुम..स्कूल ड्रेस पहने ही | मेनू कार्ड के पीछे मुँह छुपाये बैठे थे, कि कोई जान पहचान वाला देख न ले | एक पिज़्ज़ा और दो कॉफी आर्डर की थी तुमने| मैंने कॉफी की पहली घूँट लेते ही थूक दिया, "इतनी कड़वी कॉफी कौन पीता हैं "मैं बोली थी | "ऐसी ही होती हैं कॉफी, तुम ही एक चाशनी बना कर पीती हो " तुम बोले थे |
तुम जितनी शक्कर हो सकते थी मिलाते गये कॉफ़ी में | पर फिर भी कड़वी ही लगी मुझे| आखिर में तुमने ही पी मेरी कॉफी भी | " पता हैं मैंने तो जूठी कर दी थी, थूक भी दिया था थोड़ा " मैं छिटक कर हँसने लगी थी | " तभी तो पी रहा हूँ " बोलकर रोक दिया था तुमने, मेरी हँसी भी और श्वास भी |
" मैंने बात करना कम कर दिया था न हाल में | बर्लिन की एक बड़ी फर्म ने ऑफर किया था प्रोजेक्ट| होटल चेन बनाने का | बहुत बिजी रहने लगा मैं | दो सालों का कॉन्ट्रैक्ट हैं संध्या, मैं छोड़ भी नहीं सकता अभी | तुम दो साल रुक जाओ न प्लीज " तुम बोलते बोलते रुआँसा हो गये हो |
" इतना आसान नहीं होता सब "
"मुझे पता हैं एंड्रू ने तुम्हें नैटिली के बारे में बताया था | मेरी कसम संध्या कुछ नहीं हैं अब हमारे बीच |"
" रचित शांत हो जाओ, ये बात नहीं हैं |ऐसे रोयों मत प्लीज़ |"
" फिर छोड़ दो न सब | रुक जाओ मेरे लिए | इस बार निभाउंगा मैं वादा | मना कर दो शादी के लिए |"
"एक बार खुद को सुनो रचित कि क्या कह रहे हो | मना कर दूँ? क्या बोलकर? तुम तो चले जाओगे ये बोलकर |सब कुछ मुझे सहना होगा | किस उम्मीद पर सब छोड़ दूँ? मैं तुम्हें बोलूं कि छोड़ दो अपना प्रोजेक्ट तो छोड़ दोगे तुम? "
" इतना आसान नहीं होता सब "
"मुझे पता हैं एंड्रू ने तुम्हें नैटिली के बारे में बताया था | मेरी कसम संध्या कुछ नहीं हैं अब हमारे बीच |"
" रचित शांत हो जाओ, ये बात नहीं हैं |ऐसे रोयों मत प्लीज़ |"
" फिर छोड़ दो न सब | रुक जाओ मेरे लिए | इस बार निभाउंगा मैं वादा | मना कर दो शादी के लिए |"
"एक बार खुद को सुनो रचित कि क्या कह रहे हो | मना कर दूँ? क्या बोलकर? तुम तो चले जाओगे ये बोलकर |सब कुछ मुझे सहना होगा | किस उम्मीद पर सब छोड़ दूँ? मैं तुम्हें बोलूं कि छोड़ दो अपना प्रोजेक्ट तो छोड़ दोगे तुम? "
" फिर क्या करुँ मैं संध्या | पिछले पाँच साल में जब भी इंडिया आया कभी मिल नहीं पाया तुम से | कभी माँ ने रोक लिया| कभी तुम नहीं आ सकी | अब जब मिल रहे हैं तो ऐसे | मैंने सोचा था... छोड़ो हटाओ अब | हमेशा देर कर देता हूँ मैं | एक कविता थी न ये ; तुमने एक बार सुनाई थी |"
" हम्म...मुनीर नियाज़ी की "
" मुझे पर ही लिखी गई थी शायद... नहीं? हमेशा देर कर देता हूँ मैं.. कोई जरुरी बात करनी हो... कोई...कोई... "
"कोई वादा निभाना हो...उसे आवाज़ देनी हो...उसे वापस बुलाना हो...हमेशा देर कर देता हूँ मैं |"
तुम भरी आँखों से देख रहे जो मुझे | जैसे कविता पूरी करने को बोल रहे हो |
"बहुत देरीना रास्तों पर...किसी से मिलने जाना हो...बदलते मौसमों की सैर में...दिल को लगाना हो...हमेशा देर कर देता हूँ मैं| किसी को याद रखना हो...किसी को भूल जाना हो...हक़ीक़त और थी कुछ...उस को जा के ये बताना हो...हमेशा देर कर देता हूँ मैं | इतना ही याद हैं |"
मैंने किसी तरह रुकते रुकते बोली | कंठ के व्याधि को रोकते हुए, अश्कों को पोछते हुए |
"बहुत देरीना रास्तों पर...किसी से मिलने जाना हो...बदलते मौसमों की सैर में...दिल को लगाना हो...हमेशा देर कर देता हूँ मैं| किसी को याद रखना हो...किसी को भूल जाना हो...हक़ीक़त और थी कुछ...उस को जा के ये बताना हो...हमेशा देर कर देता हूँ मैं | इतना ही याद हैं |"
मैंने किसी तरह रुकते रुकते बोली | कंठ के व्याधि को रोकते हुए, अश्कों को पोछते हुए |
घर से कॉल्स आने का सिलसिला शुरू हो गया हैं | मैं बस एक एक कर के काट रही हूँ हर कॉल|
" क्या करोगी संध्या? "
"तुम क्या चाहते हो, क्या करुँ? "
रेस्टोरेंट में गाना बज रहा हैं| 'रंजिश ही सही, दिल ही दुखने के लिए आ...आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ '|
" क्या करोगी संध्या? "
"तुम क्या चाहते हो, क्या करुँ? "
रेस्टोरेंट में गाना बज रहा हैं| 'रंजिश ही सही, दिल ही दुखने के लिए आ...आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ '|
हम दोनों में से कोई नहीं बोल रहा हैं अब | कुछ बोलने से चुप रहना कितना कुछ कहता हैं न |टेबल पर पड़ी कॉफी ठंडी हो रही हैं | मैंने एक घूँट पी ली, बिना शक्कर के ही | कोई स्वाद पता नहीं लगा | न ये कॉफी मीठी ही थी, न कड़वी ही | एक निराकार सा स्वाद था | इस निराकार मुलाक़ात के जैसे |
' जैसे तुम्हें आते हैं, न जाने के बहाने... ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ '
मेरे हाथ सूख गये थे अब.. पर आँखे भीगी हैं |
" कल आओगे? " मैंने उठते हुए पूछा |
"पता नहीं " तुमने बोलकर आँखे घुमा ली |
मैं बाहर आ गई हूँ, तुम अभी भी अंदर बैठे हो | शीशे से तुम्हें देख रही हूँ | बहुत अंधेरा हो गया हैं बाहर | मैं नहीं दिख रही होंगी तुम्हें | न ही तुम चेष्टा कर रहे हो मुझे देखने की | तुम अब बस वो जूठी कॉफी पी रहे हो |

No comments:
Post a Comment