Saturday, 13 June 2020

एक मुलाक़ात (2030)

फरवरी 2030
1:00 am
उदयपुर


कितनी अजीब होती हैं न किसी अच्छे वक़्त में आकृत होती वो उदासीनता, जब पता होता हैं कि ये आनंदमयी घड़ी अब जल्द ही खत्म हो जायेगी | ये खुशियाँ क्षणिक हैं, अभी से दूरी बना लो..अगले पल सब पहले जैसा हो जायेगा | वहीं पहले जैसी रूटीन ज़िन्दगी | उन आखिरी पलों में हम असल में ख़ुश नहीं होते... बस आने वाले विराग की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं | पर हम क्यूँ खुद ही के साथ ये अन्याय करते हैं? उन बचे लम्हों को ऐसे क्यूँ ज़ायर कर देते हैं? हमारी लड़ाइयाँ भी कितनी छोटी होती हैं न | किसी बुरे वक़्त में हिम्मत ढूंढ़ने की लड़ाई, किसी अच्छे वक़्त में उसको छूटने न देने की लड़ाई | सब परिपेक्ष्य का खेल हैं.. चाहे तो हम उत्सव को भी त्रासदी बना सकते हैं और चाहे तो त्रासदी को उत्सव | किसी पल को बीती हुई यादों या आने वाले अनिश्चिंताओ के बंधन से परे रख कर उसी क्षण में जी भर कर जीना भी एक कला हैं, वो कला जो मैं अब तक नहीं सीख पायी हूँ |

शादी बस ख़त्म होने को हैं | फेरे होना शुरू हुए हैं | पता नहीं क्यूँ पर मैं सार्थक को पहचान नहीं पा रही हूँ | लग रहा हैं वो अब बस मेरा भाई नहीं, बहुत सी नई भूमिकाओं में बंध गया हैं, जिसमें उसका मेरा भाई होना एक छोटा पहलू हैं | थप्पड़ नहीं मार पाऊँगी अब, पहले जैसे डांट भी नहीं पाऊँगी|सारे रिश्तेदार कल एक एक करके चले जायेंगे... सार्थक भी |ये सारे सजावट के फूल कहीं सूखे गिरे होंगे...मंडप की सारी सामाग्री महज़ राख बन गई होगी | अग्निकुंड से उठती लपटों की दूसरी तरफ सब धुंधला हैं,  पर अचानक ऐसा लगा मानों तुम खड़े ही वहाँ | ये मरीचिका हैं... कोई वहम हैं | मैंने ध्यान से देखा तो उस अस्थिर धुएँ के पीछे तुम ही थे |

मैं जल्दी से तुम्हारे पास पहुंची | एक बार हाथ पकड़के विश्वास कर लिया कि तुम ही हो |
"किसी ने बताया नहीं कि तुम आ रहे हो " मैंने अपनी हैरानी को छुपाते हुए पूछा |
"इतना इम्पोर्टेन्ट नहीं हूँ मैं शायद की अलग से बताया जाये तुम्हें "
"कब आये | और मुझसे मिले भी नहीं "
" अरे अभी दो घंटे ही हुए हैं... तुम्हें ढूंढा तो तुम बहुत बिजी थीं काम में.. बार बार कुछ लाने को कभी इधर कभी उधर भाग रही थीं तो मैंने सोचा बाद में मिल लूंगा "
"मुझे लगा नहीं था रचित कि तुम आओगे "
"मुझे भी नहीं लग रहा था, वो तो माँ ने ताने मार मार कर भेजा| तुम्हारी शादी में नहीं आया था न तो गुस्सा थीं वो | "
"उनकी तबीयत ठीक हैं अब? "
"हाँ कहती तो यहीं हैं, मैं भी ज्यादा मिल नहीं पता | वो छोड़ो, तुम्हारे भाई की शादी हैं तो तुम्हें बुलाना चाहिए था न मुझे "
"अच्छा... अचानक से तुम बात बंद कर दो और फिर मुझे बोलो की मैंने नहीं बुलाया | कितनी बार कॉल किया, कितने दिनों तक किया, याद भी हैं?  थक गई थीं तुम्हें मनाते मनाते "
" हम्म बहुत वक़्त लग गया हक़ीक़त को अपनाने में... खुद से नज़र मिलाने में " 
" छोड़ो पहली बार थोड़े हैं, तुम्हारी तो पुरानी आदत हैं " मैंने हँस कर बात टाल दी |

" सामान अंदर होटल में रख दो न " मैंने तुम्हारे बैग को देखते हुए कहा |
"नहीं कोई नहीं, एक बैग ही है... सुबह यहीं से निकल जाऊंगा "
"आज सुबह ही चले जाओगे? "
"नहीं रात की ट्रैन हैं | दिन भर में घूम लूंगा उदयपुर, जब आया ही हूँ तो "
" ये सही हैं.. घूमना ज्यादा जरुरी हैं अब तुम्हारे लिए... ये नहीं की ढंग से बात ही करलो मुझसे थोड़ा रुक कर "
"तुम भी चलना फिर घूमने... घूमते घूमते बात करेंगे "
"देखती हूँ " मैंने थोड़ी बुझी आवाज़ में कहा | पता था बहुत मुश्किल होगा जा पाना | जैसे जैसे उम्र बढ़ती हैं, जिम्मेदारियां कितनी बढ़ जाती हैं | उनके बीच ऐसे फंस जाते हैं कि शायद अपने लिए जीना भूल जाते हैं |

" सार्थक की शादी हो गई... यकीन ही नहीं होता| अभी तो वीडियो गेम्स में हार जाने पर रोता था | याद हैं हम दोनों को कहीं बाहर मिलना होता था आंटी को न बताने के दस रूपये लेता था और उसी में ख़ुश हो जाता था| आज दूल्हा बन गया हैं |" तुम सार्थक को देखते हुए कह रहे हो | मंत्र वगैरह बंद हो गये हैं | सब दूल्हा दुल्हन को लेकर अंदर जा रहे हैं बाक़ी रस्मों के लिए... मेहमानों की गिनती कम हो रही हैं |
" तुमने क्यूँ नहीं की अभी तक "
" अपनी बर्बादी नहीं करनी अपने हाथों "
" क्यूँ मैं बर्बाद लगती हूँ क्या तुम्हें...  बताओ न क्यूँ नहीं की"
"तुम नहीं मिली न इसलिए "
"अरे बताओ न कब करोगे "
" जब तुम इस गँजे को छोड़ दोगी न तब "
मैंने बिना देखे दो तीन मुक्के मार दिए तुम्हें और खिलखिला कर हंसने लगी |
" ख़बरदार जो ऐसे बोला मेरे पति को "
"अब गँजे को गंजा ही बोलेंगे न "
" जेनेटिक हैं, कुछ सालों में तुम्हारे झड़ जाये उससे पहले ढूंढ़ लो कोई.. वरना फिर कोई मानेगा भी नहीं.. समझें | और राघव को तो मैं छोड़ने से रही "
" इतना प्यार करती हो उससे "
"और क्या "
"तुम ख़ुश हो न संध्या? "
"हाँ, क्यूँ नहीं लग रही क्या...और तुम? "
"मेरा क्या हैं... ठीक ही हूँ "
" ब्रेकअप हुआ हैं क्या हाल में? "
" अरे नहीं... रिलेशनशिप होंगे तब न ब्रेकअप... बस फ्लिंग्स... वन नाईट स्टैंड... यहीं सब हैं "
" हम्म काम में कोई दिक्कत हैं? "
" नहीं सब सही ही हैं | थक जाता हूँ अब जल्दी | कुछ बड़ा करने के बाद भी पहले जैसी ख़ुशी नहीं मिलती | बस ढूंढ़ता रहता हूँ कि कहा मिलेगी अब वो पहले जैसी ख़ुशी अब |
"मिड लाइफ क्राइसिस? "
" हम्म.. शायद वहीं...या पता नहीं संध्या... हमेशा कुछ कम लगता हैं... अभी तुमसे बात कर रहा हूँ तो शायद पहली बार सोच रहा हूँ "
"बहुत नॉर्मल हैं ऐसा लगना रचित | सबको जिंदगी के किसी मोड़ पर लगता ही होगा ऐसा... निकल जायेगा ये वक़्त... बस कोशिश करते रहो... ढूंढ़ते रहो कौन सी चीज़ ख़ुशी देती हैं...बाक़ी ज़िन्दगी बहुत लम्बी हैं"
"तुम इतनी सुलझी हुई कैसे हो? "
"जो बहुत सुलझे हुए लगते हैं न, असल में सबसे ज्यादा उलझें हुए होते हैं "

" उदयपुर में शादी क्यूँ? डेस्टिनेशन वेडिंग?  "
" आकृति यहीं की हैं| दोनों की लव मैरिज हैं... कॉलेज स्वीटहार्ट्स "
" सही... कितना अच्छा होता हैं न... कुछ लोगों के लिए सब इतना आसान होता हैं... कुछ लोगों के लिए ख़ुश रहना इतना मुश्किल "
" क्या फ़र्क़ पड़ता हैं लेकिन...ये जरुरी थोड़े हैं कि तुम जो चाहो वो तुम्हें कितनी देर, कितनी जद्दोजहद के बाद मिले | ये मायने रखता हैं कि बस वो मिल जाये... क्यूँकि फिर बाक़ी सारी बातों का कोई महत्त्व नहीं रहता "
" और अगर मिलना लिखा न हो तो कभी?  " तुम्हारी आवाज़ में एक कंपित करने वाली मायूसी थीं |

इससे पहले मैं कुछ कहती मम्मी ने आवाज़ लगाई मुझे | फिर खुद ही मेरे पास आकर चिक्की को हाथ में देकर चली गई | अचानक से नींद से उठ गई थीं वो... जोर जोर से रो रही थीं | कुछ देर बाद शांत हो गई हैं | तुम्हें बहुत आश्चर्य से देखने लगी  | तुम उसे देख कर तरह तरह के चेहरे बना रहे हो | अब वो खिलखिलाकर हँस पड़ी हैं | तुम्हारे हाथों का पीछा कर रही हैं | तुम उसके मोटे मोटे गाल खींच रहे हो |
" फोटो से ज्यादा क्यूट लग रही हैं सामने "
" फोटो देखी हैं तुमने इसकी "
" और क्या...खुद से ज्यादा तो इसकी तस्वीरों से भरी हुई रहती हैं तुम्हारी टाइमलाइन "
"स्टॉकर कहीं के "
तुमने अब अपनी गोद में ले लिया हैं उसे और निहार रहे हो |
" कितने साल की हैं? "
"दो "
" तुम्हारे जैसी नहीं दिखती और न ही राघव जैसी "
" हाँ... तुम्हारे जैसी लगती होगी न "
" कह सकते हैं... देखों आंखे कितनी बड़ी बड़ी हैं... तुम्हारे जैसी छोटी नहीं... नाक भी ऊँची सी... मेरे जैसी... ऊपर से इतने घने  बाल हैं तो बाप पर तो नहीं गई हैं " तुम कहकर हँस रहे हो |
"जब होने वाली थीं तो तुम्हारे बारे में सोचती थीं न... इसलिए तुम्हारे जैसी लगती हैं "
तुमने ज़वाब में कुछ नहीं कहा.. तुम बस उसके चेहरे पर हाथ फेर रहे और तुम्हारे हाथ ज़रा ज़रा काँप रहे हैं |

"बहुत बोलती हैं.. अभी बहुत भीड़ देख कर... नए चेहरे देख कर चुप हो गई हैं | " मैंने फिर से कुछ बात शुरू करने के लिए कहा |
" वैसे बड़े होकर तुम्हें अच्छे से कोसेगी ये ...  कैसा नाम रखा हैं... चिक्की "
"अरे वो तो घर का हैं न... तुम्हें क्या लगा इतनी पागल हूँ "
" हाँ वो तो लगता ही हैं... क्या नाम हैं फिर "
"संचिता "
तुम्हारा मुस्कुराना बंद ही गया और चेहरे पर एक गंभीर मुद्रा हैं |

" और तुम्हारे घर में गोल दरवाज़े हैं या नहीं? "
" नहीं,  न कोई पेट हैं.. इस अकेले को पालना मुश्किल हो रहा हैं| तुम बताओ तुम्हारा घर कैसा हैं?  "
"मैं क्या बतायूँ |जो घर मैं बनाना चाहता था वो कभी बना ही नहीं और शायद न कभी बनेगा..."
"ऐसा क्यूँ सोचते हो,  ज़िन्दगी बहुत लम्बी हैं,  इतनी जल्दी कुछ कैसे मान सकते हो "
" थक गया हूँ मैं... हार गया हूँ मैं, सबसे... तुमसे... खुद से "
" इतनी जल्दी क्यूँ हार मान रहे हो | वक़्त सब ठीक कर देता हैं... बस थोड़ा वक़्त दो रचित | तुम्हें समझती हूँ मैं और जानती हूँ कि मुश्किल हैं पर तुम खुद को ऐसे मत कोसो इस सब के लिए | मैं ये नहीं कह रही भूल जाओ...बस जिस कहानी को पूरा नहीं किया जा सकता उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना चाहिए | शायद कोई और कहानी हो जो किसी दूसरे मोड़ पर तुम्हारा इंतज़ार कर रही हो पर तुमने चलना ही छोड़ दिया हैं | "
"बहुत बातें बना लेती हो वैसे तुम | थेरेपिस्ट बन जाना चाहिए तुम्हें | वैसे आज बहुत दिनों बाद थोड़ा अच्छा लगा हैं... थोड़ा सुकून मिला हैं "
" देखा मैं कहती हूँ न बात करने से सब सुलझ जाता हैं, तुम हो कि हमेशा कतराते हो.. दूर भागते हो "

इस बार घंटो की गिनती नहीं हैं हमारी मुलाक़ात में... न एक दूसरे से कोई सवाल या गुंजाईश | हैं तो बस एक अजीब सा खालीपन... एक अजीब सी दूरी जिसे कितने ही हर्फ़, कितनी ही कोशिशे मिटा नहीं सकती | हम दोनों ही चुपचाप देख रहे हैं खाली मैदान को, महसूस कर रहे हैं एक ठहराव को | इस बार कोई जल्दी नहीं हैं... इस बार कोई गाना नहीं हैं | या शायद हैं एक गाना जो मेरे अंतर्मन में कहीं गूँज रहा हैं | 'माना के हम यार नहीं, लो तय है के प्यार नहीं...फिर भी नज़रें ना तुम मिलाना, दिल का ऐतबार नहीं'|

अचानक कोई रिश्तेदार मेरे पास आकर खुल्ले पैसे माँगने लगी... शगुन में देने को | एक पल को भूल गई थीं मैं कि कहाँ हूँ...सपनों की किसी और ही दुनिया में पहुंच गई थीं | मैं पर्स निकाल कर पैसे ढूंढ़ने लगी | तुमने पर्स पड़ी एक चिल्ड्रन बुक निकाल ली हैं और पलटने लगे हो |
"इसको भी शुरू कर दी कहानियाँ सुनाना " तुम उन रंगीन चित्रों वाले पन्नों को पलटते हुए पूछने लगे | कुछ पन्नों बाद रुक जाते हो तुम, एक पुराने बुकमार्क को देखकर | वो बुकमार्क जिसपर लिखें हैं दो अक्षर और एक अधूरी कहानी |
" तुमने तो कहा था की फेंक दिया... "
" गुस्से में कह दिया था... ऐसे कैसे फेंक देती "

तुम नज़रे झुकाये बैठे हो | फिर कुछ याद आते ही अपने बैग में कुछ ढूंढ़ने लगते हो | एक साड़ी और एक नॉवेल |
" इस बार नहीं भूला... ले ही आया तुम्हारे लिए नॉवेल "
" गुनाहों का देवता... पढ़ चुकी हूँ "
"पता हैं... फिर भी "
तभी माँ किसी काम से बुलाने लगती हैं | मैं संचिता को तुम्हारी गोद में रखकर उठ गई हूँ | मुझे पता हैं कि कल नहीं आ पाऊँगी तुम्हारे साथ... पता हैं कि दिलासा देने को मैंने बहुत सी बातें कह दी हैं मैंने जो मेरे लिए अभी तक मुमकिन नहीं हो पाई हैं... पता हैं कि अभी कुछ वक़्त हैं तुम्हारे साथ पर मैं ज़ायर कर दूंगी उसे ये सोचते हुए कि फिर चले जाओगे तुम वापस न आने के लिए...पता हैं कि रंजिश का वो उफान जिसे दबाये बैठी थीं फिर उमड़ आया हैं एकाएक...सीने में फिर वहीं कचोट हैं और फिर तुम दूर हो | मैंने चलते चलते हाथ में पड़ी नॉवेल को एक बार पलटा | पन्नों के बीच से कुछ पुराने टूटे बाल निकले और हवा में झूलते हुए नीचे ज़मीन पर गिर गये |छूट चुके हो तुम अब हमेशा हमेशा के लिए उस गिरह से  |


एक मुलाकात

मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी
सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था…
फिर समुन्द्र को खुदा जाने क्या ख्याल आया
उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी
मेरे हाथों में थमाई
और हंस कर कुछ दूर हो गया
हैरान थी….
पर उसका चमत्कार ले लिया
पता था कि इस प्रकार की घटना
कभी सदियों में होती है…..

लाखों ख्याल आये
माथे में झिलमिलाये

पर खड़ी रह गयी कि उसको उठा कर
अब अपने शहर में कैसे जाऊंगी?

मेरे शहर की हर गली संकरी
मेरे शहर की हर छत नीची
मेरे शहर की हर दीवार चुगली

सोचा कि अगर तू कहीं मिले
तो समुन्द्र की तरह
इसे छाती पर रख कर
हम दो किनारों की तरह हंस सकते थे

और नीची छतों
और संकरी गलियों
के शहर में बस सकते थे….

पर सारी दोपहर तुझे ढूंढते बीती
और अपनी आग का मैंने
आप ही घूंट पिया

मैं अकेला किनारा
किनारे को गिरा दिया
और जब दिन ढलने को था
समुन्द्र का तूफान
समुन्द्र को लौटा दिया….

अब रात घिरने लगी तो तूं मिला है
तूं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल
मैं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल
सिर्फ- दूर बहते समुन्द्र में तूफान है…..
~अमृता प्रीतम


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